शुक्रवार, 2 जून 2017

मुस्लिम सिर्फ दाढ़ी रखते हैं मुछ नहीं!

हर धर्म को पहचानने के लिए हम सब ने अपने दिमाग में कई तस्वीरें बना रखी हैं। अगर किसी व्यक्ति ने पगड़ी पहन रखी हैं तो वह पंजाबी ही होगा या किसी ने अगर धोती पहनी हैं तो वह हिन्दू होगा या फिर किसी व्यक्ति ने अगर टोपी लगायी हैं और दाढ़ी रखी हैं तो वह मुसलमान ही होगा लेकिन यह सब हमारे दिमाग का सिर्फ एक मज़हबी फ़ितूर मात्र हैं।
पर कभी आपने सोचा कि मुस्लिम सिर्फ दाढ़ी क्यों रखते हैं मूछें नहीं? आईएं आज हम आप को बताते हैं मुस्लिम धर्म से जुड़ी एक दिलचस्प बात। दरअसल यह कहा जाता हैं कि हिन्दू धर्म ही सबसे पुराना और सनातन धर्म हैं। हिन्दू धर्म का इतिहास कितना पुराना हैं इस बात की पुष्टि अभी तक नहीं हुई हैं, वही इस्लाम धर्म लगभग 1400 साल पुराना हैं।
वेद व्यास जी अभी तक 18 पुराण लिख चुके हैं और भविष्य पुराण उनमे से एक हैं। हिन्दू धर्म के अंतर्गत कई तरह के पुराण और ग्रन्थ लिखे गए हैं और उन्ही ग्रन्थों में से एक भविष्य पुराण में इस्लाम से जुड़ी भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी। इस पुराण में लगभग 50000 श्लोक थे लेकिन तक्षशिला विश्व विद्यालय में रखे इस ग्रन्थ को मुग़ल शासन काल में जला दिया गया पर उस किताब में से 129 अध्याय और लगभग 14000 श्लोक बच गए थे।
इस किताब में यह पहले से ही उल्लेखित था कि उस वक़्त के तात्कालीन राजा हर्षवर्धन के साथ और कई राजा, अलाउदीन, तुगलक, तैमुर, बाबर, और अकबर जैसे मुगलों का इस काल आना होगा। इस पुराण में ईसाई धर्म के प्रमुख ईसा मसीह के जन्म का भी प्रमाण मिलता हैं।
लेकिन इससे पहले भी अपने भारत देश की शक्ति कम होती देख एक और राजा हुए, जो राजा भोज के नाम से जाने गए और उन्होंने तय किया कि अपनी मातृभूमि की रक्षा करने के लिए दुनिया जीतने निकलना ही पड़ेगा। अपनी दस हज़ार सेना को साथ लेकर कई विद्वानों और कालीदास जैसे बुध्हिजीवी राजा के साथ आगे बढ़े।
सिन्धु नदी पार करके गंधार और कशमीर में शठ राजाओं को हरा कर राजा भोज की सेना ईरान और अरब होते हुए मक्का पहुची। वहां के मरुस्थल में पहुच कर जब वहां उन्होंने एक शिवलिंग देखा तो उसकी पूजा करते हुए वह भगवान् शिव का ध्यान करने लगे।
भगवान् शिव भी राजा भोज की प्रार्थना सुनकर उनसे बात करने आये और उनसे कहा कि तुम्हे यहाँ नहीं आना चाहियें था वत्स। तुम्हे मक्केश्वेर (जिसे आज हम मक्का के नाम से जानते हैं) के बजाये उज्जैन महाकालेश्वेर को पूजना चाहियें। इस स्थान पर अब एक राक्षस त्रिपुरासुर, जिसका मैंने वध किया था, उसके मानने वालें लोगों को असुरराज बाली से संरक्षण प्राप्त हो रहा हैं और इस समुदाय का प्रमुख “महा-मद” (मद से भरा हुआ व्यक्ति जिसे आज मोहम्मद भी कहते हैं) उत्पात मचा रहा हैं इसलिए तुम इस मलेच्छ जगह से चले जाओ।
भगवान् शिव की बात सुनकर राजा भोज जब लौटने लगे तब “महा-मद” वहा आ गया और राजा भोज से कहा कि आप का आर्यधर्म विश्व का सर्वश्रेष्ट धर्म हैं, लेकिन मैं आपके शिव की मदद से ही एक ऐसे धर्म की स्थापना करूँगा जो अपनी क्रूरता के लिए जाना जायेगा। इसे मानने वालो को अपना लिंगाछेदन (खतना) कर के, बिना तिलक और बिना मुछों के सिर्फ दाढ़ी रखना अनिवार्य होगा। मेरा यह सम्प्रदाय उन्हें बहुत प्रिय होगा जिसे कुछ भी खाना (मांस) स्वीकार्य होगा और अपनी इस बात का यकीन दिलाने के लिए मैं आपके देश में आकर अपने मूंछ के बाल को त्याग दूँगा।
कश्मीर के हजरत बल मज्जिद में आज भी हजरत मोहम्मद के मुछों के उन बालों को सुरक्षित रखा गया हैं। हजरत के उस बाल को “मोई-ए-मुकद्दस” के नाम से जाना जाता हैं। हर मुस्लिमों के लिए उस बाल का दर्शन हो सके इसके लिए साल में एक या दो बार ही उस बक्से को खोला जाता हैं।

बुधवार, 24 मई 2017

मूल ज्ञान

33 करोड़ नहीं 33 कोटी देवी देवता हैँ हिंदू धर्म में ;

कोटि = प्रकार ।
देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते हैं ।

कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता ।

कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिंदू धर्म में :-

12 प्रकार हैँ :-
आदित्य , धाता, मित, आर्यमा,
शक्रा, वरुण, अँशभाग, विवास्वान, पूष, सविता, तवास्था, और विष्णु...!

8 प्रकार हैं :-
वासु:, धरध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।

11 प्रकार हैं :-
रुद्र: ,हरबहुरुप, त्रयँबक,
अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी,
रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।
                       एवँ
दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार ।

कुल :- 12+8+11+2=33 कोटी

         📜😇  दो पक्ष-

कृष्ण पक्ष ,
शुक्ल पक्ष !

         📜😇  तीन ऋण -

देव ऋण ,
पितृ ऋण ,
ऋषि ऋण !

         📜😇   चार युग -

सतयुग ,
त्रेतायुग ,
द्वापरयुग ,
कलियुग !

         📜😇  चार धाम -

द्वारिका ,
बद्रीनाथ ,
जगन्नाथ पुरी ,
रामेश्वरम धाम !

         📜😇   चारपीठ -

शारदा पीठ ( द्वारिका )
ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम )
गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) ,
शृंगेरीपीठ !

         📜😇 चार वेद-

ऋग्वेद ,
अथर्वेद ,
यजुर्वेद ,
सामवेद !

         📜😇  चार आश्रम -

ब्रह्मचर्य ,
गृहस्थ ,
वानप्रस्थ ,
संन्यास !

         📜😇 चार अंतःकरण -

मन ,
बुद्धि ,
चित्त ,
अहंकार !

         📜😇  पञ्च गव्य -

गाय का घी ,
दूध ,
दही ,
गोमूत्र ,
गोबर !

         📜😇  पञ्च देव -

गणेश ,
विष्णु ,
शिव ,
देवी ,
सूर्य !

         📜😇 पंच तत्त्व -

पृथ्वी ,
जल ,
अग्नि ,
वायु ,
आकाश !

         📜😇  छह दर्शन -

वैशेषिक ,
न्याय ,
सांख्य ,
योग ,
पूर्व मिसांसा ,
दक्षिण मिसांसा !

         📜😇  सप्त ऋषि -

विश्वामित्र ,
जमदाग्नि ,
भरद्वाज ,
गौतम ,
अत्री ,
वशिष्ठ और कश्यप!

         📜😇  सप्त पुरी -

अयोध्या पुरी ,
मथुरा पुरी ,
माया पुरी ( हरिद्वार ) ,
काशी ,
कांची
( शिन कांची - विष्णु कांची ) ,
अवंतिका और
द्वारिका पुरी !

         📜😊  आठ योग -

यम ,
नियम ,
आसन ,
प्राणायाम ,
प्रत्याहार ,
धारणा ,
ध्यान एवं
समािध !

         📜😇 आठ लक्ष्मी -

आग्घ ,
विद्या ,
सौभाग्य ,
अमृत ,
काम ,
सत्य ,
भोग ,एवं
योग लक्ष्मी !

         📜😇 नव दुर्गा --

शैल पुत्री ,
ब्रह्मचारिणी ,
चंद्रघंटा ,
कुष्मांडा ,
स्कंदमाता ,
कात्यायिनी ,
कालरात्रि ,
महागौरी एवं
सिद्धिदात्री !

         📜😇   दस दिशाएं -

पूर्व ,
पश्चिम ,
उत्तर ,
दक्षिण ,
ईशान ,
नैऋत्य ,
वायव्य ,
अग्नि
आकाश एवं
पाताल !

         📜😇  मुख्य ११ अवतार -

मत्स्य ,
कच्छप ,
वराह ,
नरसिंह ,
वामन ,
परशुराम ,
श्री राम ,
कृष्ण ,
बलराम ,
बुद्ध ,
एवं कल्कि !

         📜😇 बारह मास -

चैत्र ,
वैशाख ,
ज्येष्ठ ,
अषाढ ,
श्रावण ,
भाद्रपद ,
अश्विन ,
कार्तिक ,
मार्गशीर्ष ,
पौष ,
माघ ,
फागुन !

         📜😇  बारह राशी -

मेष ,
वृषभ ,
मिथुन ,
कर्क ,
सिंह ,
कन्या ,
तुला ,
वृश्चिक ,
धनु ,
मकर ,
कुंभ ,
कन्या !

         📜😇 बारह ज्योतिर्लिंग -

सोमनाथ ,
मल्लिकार्जुन ,
महाकाल ,
ओमकारेश्वर ,
बैजनाथ ,
रामेश्वरम ,
विश्वनाथ ,
त्र्यंबकेश्वर ,
केदारनाथ ,
घुष्नेश्वर ,
भीमाशंकर ,
नागेश्वर !

         📜😇 पंद्रह तिथियाँ -

प्रतिपदा ,
द्वितीय ,
तृतीय ,
चतुर्थी ,
पंचमी ,
षष्ठी ,
सप्तमी ,
अष्टमी ,
नवमी ,
दशमी ,
एकादशी ,
द्वादशी ,
त्रयोदशी ,
चतुर्दशी ,
पूर्णिमा ,
अमावास्या !

         📜😇 स्मृतियां -

मनु ,
विष्णु ,
अत्री ,
हारीत ,
याज्ञवल्क्य ,
उशना ,
अंगीरा ,
यम ,
आपस्तम्ब ,
सर्वत ,
कात्यायन ,
ब्रहस्पति ,
पराशर ,
व्यास ,
शांख्य ,
लिखित ,
दक्ष ,
शातातप ,
वशिष्ठ !

रविवार, 16 अप्रैल 2017

पानी

बिक रहा है पानी,पवन बिक न जाए
बिक गयी है धरती, गगन बिक न जाए।

चाँद पर भी बिकने लगी है जमीं
डर है की सूरज की तपन बिक न जाए।

हर जगह बिकने लगी है स्वार्थ नीति
डर है की कहीं धर्म बिक न जाए।

देकर दहॆज ख़रीदा गया है अब दुल्हे को
कही उसी के हाथों दुल्हन बिक न जाए।

हर काम की रिश्वत ले रहे अब ये नेता
कही इन्ही के हाथों वतन बिक न जाए।

सरे आम बिकने लगे अब तो सांसद
डर है की कहीं संसद भवन बिक न जाए।

आदमी मरा तो भी आँखें खुली हुई हैं
डरता है मुर्दा, कहीं कफ़न बिक न जाए।

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

श्रीकृष्ण प्रेम

गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं! अर्जुन- ‘धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोस्मी भरतार्शभा’
धर्म से अविरुद्ध, धर्म सम्मत जो काम है। वह मैं हूँ। जो धर्म के विरुद्ध हो वह नहीं, धर्मसम्मत काम मैं हूँ।

कितनी अच्छी बात है। पर आज समाज में श्रेष्ठ कहलाने वाले वे धर्माज्ञानी लोग भगवान् श्रीकृष्ण की तुलना रोमियो से करते हैं। श्रीकृष्ण महायोगी हैं, श्रीकृष्ण जगद्गुरु हैं, जिन्होंने इस संसार को प्रेम सिखाया, वह प्रेम कैसा है सात्विक है। श्रीकृष्ण ने कभी किसी स्त्री का वस्त्र नहीं उतारा वे तो वस्त्र प्रदान करते है स्त्री की लज्जा को ढकने वाले हैं।

उनके जितना सामर्थ किसी में नहीं। पहले श्रीकृष्ण क्या हैं यह जानो और जिस दिन यह जान गए तुम्हे भी उनसे प्रेम हो जाएगा। ----आचार्य राकेश

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

भगवान् कल्कि अवतार

भगवान कल्कि अवतार का जन्म कब, कहाँ, क्यों और कौन होंगे माता-पिता ?

धार्मिक एवं पौराणिक मान्यता के अनुसार जब पृथ्वी पर पाप बहुत अधिक बढ़ जाएगा। तब दुष्टों के संहार के लिए विष्णु का यह अवतार यानी 'कल्कि अवतार'  प्रकट होगा। कल्कि को विष्णु का भावी और अंतिम अवतार माना गया है। भगवान का यह अवतार निष्कलंक भगवान के नाम से भी जाना जायेगा। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा की भगवान श्री कल्कि 64 कलाओं के पूर्ण निष्कलंक अवतार हैं।

भगवान श्री कल्कि की भक्ति इस समय एक ऐसे कवच के समान है जो हमारी हर प्रकार से रक्षा कर सकती है। भगवान श्री कल्कि की भक्ति व्यक्तिगत न होकर समष्टिगत है। जो भी व्यक्ति भगवान श्री कल्कि की भक्ति करता है, वह चाहता है कि भगवान शीघ्र अवतार धारण कर भूमि का भार हटाएं और दुष्टों का संहार करें।

कलियुग यानी कलह-क्लेश का युग, जिस युग में सभी के मन में असंतोष हो, सभी मानसिक रूप से दुखी हों, वह युग ही कलियुग है। हिंदू धर्म ग्रंथों में चार युग बताए गए हैं।

सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग। सतयुग में लोगों में छल, कपट और दंभ नहीं होता है। त्रेतायुग में एक अंश अधर्म अपना पैर जमा लेता है। द्वापर युग में धर्म आधा ही रह जाता है। कलियुग के आने पर तीन अंशों से इस जगत पर अधर्म का आक्रमण हो जाता है।

इस युग में धर्म का सिर्फ एक चैथाई अंश ही रह जाता है। सतयुग के बाद जैसे-जैसे दूसरा युग आता-जाता है। वैसे-वैसे मनुष्यों की आयु, वीर्य, बुद्धि, बल और तेज का ह्रास होता जाता है।

भगवान कल्कि अवतार Bhagwan Kalki Avatar
माना जाता है और जैसा वर्तमान में चल रहा है कि कलियुग के अंत में संसार की ऐसी दशा होगी। लोग मछली-मांस ही खाएँगे और भेड़ व बकरियों का दूध पिएँगे। गाय तो दिखना भी बंद हो जाएगी। सभी एक-दूसरे को लूटने में रहेंगे।

व्रत-नियमों का पालन नहीं करेंगे। उसके विपरित वेदों की निंदा करेंगे। स्त्रियाँ कठोर स्वभाव वाली व कड़वा बोलने वाली होंगी। वे पति की आज्ञा नहीं मानेंगी। अमावस्या के बिना ही सूर्य ग्रहण लगेगा। अपने देश छोड़कर दूसरे देश में रहना अच्छा माना जाएगा।

व्याभिचार बढ़ेगा। उस समय मनुष्य की औसत आयु सोलह साल होगी। सात-आठ वर्ष की उम्र में पुरुष व स्त्री समागम करके संतान उत्पन करेंगे। पति व पत्नी अपनी स्त्री व पुरुष से संतुष्ट नहीं रहेंगे।

मंदिर कहीं नहीं होंगे। युग के अंत में प्राणियोें का अभाव हो जाएगा। तारों की चमक बहुत कम हो जाएगी। पृथ्वी पर गर्मी बहुत बढ़ जाएगी। इसके बाद सतयुग का आरंभ होगा। उस समय काल की प्रेरणा से भगवान विष्णु का कल्कि अवतार होगा।

भगवान कल्कि
यह अवतार दशावतार परम्परा में अन्तिम माना गया। शास्त्रों के अनुसार यह अवतार  भविष्य में होने वाला है। कलियुग के अन्त में जब शासकों का अन्याय बढ़ जायेगा। चारों तरफ पाप बढ़ जायेंगे तथा अत्याचार का बोलबाला होगा तक इस जगत् का कल्याण करने के लिए भगवान् विष्णु कल्कि के रूप में अवतार लेंगे।

कल्कि अवतार का वर्णन कई पुराणों में हुआ है परन्तु इसे सर्वाधिक विस्तार कल्कि उपपुराण मे मिला है, उसमें यह कथा उन्नीस अध्यायों  में वर्णित है।

  भगवान कल्कि
अभी  तो  कलियुग  का  प्रथम  चरण  है।  कलि  के  पाँच  सहस्र  से  कुछ अधिक समय बीता है। इस समय मानव जाति का मानसिक एवं नैतिक पतन हो  गया  है  लेकिन  जैसे-जैसे  समय  बीतता  जायेगा  वैसे-वैसे  धर्म  की  हानि होगी। सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, आयु, बल और स्मरण शक्ति सबका लोप होता जायेगा। अर्थहीन व्यक्ति असाधु माने जायेंगे।

राजा दुष्ट, लोभी, निष्ठुर होंगे, उनमें व लुटेरों में कोई अन्तर नहीं होगा। प्रजा वनों व पर्वतों में छिपकर अपना जीवन बितायेगी। समय पर बारिश नहीं होगी, वृक्ष फल नहीं देंगे।

कलि के प्रभाव से प्राणियों के शरीर छोटे-छोटे, क्षीण और रोगग्रस्त होने लगेंगे।  मनुष्यों  का  स्वभाव  गधों  जैसा  दुस्सह,  केवल  गृहस्थी  का  भार  ढोने वाला  रह  जायेगा।  लोेग  विषयी  हो  जायेंगे।  धर्म-कर्म  का  लोप  हो  जायेगा। मनुष्य जपरहित नास्तिक व चोर हो जायेंगे।

पुत्रः पितृवधं कृत्वा पिता पुत्रवधं तथा।
निरुद्वेगो वृहद्वादी न निन्दामुपलप्स्यते।।
म्लेच्छीभूतं जगत सर्व भविष्यति न संशयः।
हस्तो हस्तं परिमुषेद् युगान्ते समुपस्थिते।।

पुत्र,  पिता  का  और  पिता  पुत्र  का  वध  करके  भी  उद्विग्न  नहीं  होंगे। अपनी  प्रशंसा  के  लिए  लोग  बड़ी-बड़ी  बातें  बनायेंगे  किन्तु  समाज  में  उनकी निन्दा  नहीं  होगी।  उस  समय  सारा  जगत्  म्लेच्छ  हो  जायेगा-इसमें  संशयम नहीं। एक हाथ दूसरे हाथ को लूटेगा। सगा भाई भी भाई के धन को हड़प लेगा।

अधर्म फैल जायेगा, पत्नियाँ अपने पति की बात नहीं मानेंगी। मांगने पर भी पतियों को अन्न, जल नहीं मिलेगा। चारों तरफ पाप फैल जायेगा।

उस समय सम्भल ग्राम में विष्णुयशा नामक एक अत्यन्त पवित्र, सदाचारी एवं श्रेष्ठ ब्राह्मण अत्यन्त अनुरागी भक्त होंगे। वे सरल एवं उदार होंगे। उन्हीं अत्यन्त भाग्यशाली  ब्राह्मण  विष्णुयशा  के  यहाँ  समस्त  सद्गुणों  के  एकमात्र  आश्रय निलिख सृष्टि के सजर्क, पालक एवं संहारक परब्रह्म परमेश्वर भगवान् कल्कि के  रूप  में  अवतरित  होंगे। 
वे  महान्  बुद्धि  एवं  पराक्रम  से  सम्पन्न  महात्मा, सदाचारी तथा सम्पूर्ण प्रजा के शुभैषी होंगे।

मनसा तस्य सर्वाणिक वाहनान्यायुधानि च।।
उपस्थास्यन्ति योधाश्च शस्त्राणि कवचानि च।
स धर्मविजयीराजा चक्रवर्ती भविष्यति।।
स चेमं सकुलं लोकं प्रसादमुपनेश्यति।
उत्थितो ब्राह्मणों दीप्तःक्षयान्तकृतदुदारधीः।।

चिन्तन करते ही उनके पास इच्छानुसार वाहन, अस्त्र-शस्त्र, योद्धा और कवच उपस्थित  जायेंगे। वह  धर्मविजयी चक्रवर्ती राजा होगा। वह  उदारबुद्धि, तेजस्वी  ब्राह्मण  दुःख  से  व्याप्त हुए  इस  जगत्  को  आनन्द  प्रदान करेगा। कलियुग का अन्त करने के लिए उनका प्रादुर्भाव होगा।

भगवान्  शंकर  स्वयं  उनको  शस्त्रास्त्र  की  शिक्षा  देंगे  और  भगवान् परशुराम उनके वेदोपदेष्टा होंगे। वे देवदत्त नामक शीघ्रागमी अश्व पर आरुढ़ होकर राजा के वेश में छिपकर रहने वाले पृथ्वी पर सर्वत्र फैल हुए दस्युओं एवं  नीच  स्वभाव  वाले  सम्पूर्ण  म्लेच्छों  का  संहार  करेंगे।  कल्कि  भगवान्  के करकमलों  सभी  दस्युओं  का  नाश  हो  जायेगा  फिर  धर्म  का  उत्थान  होगा। उनका  यश  तथा  कर्म  सभी  परम  पावन  होंगे।  वे  ब्रह्मा  जी  की  चलायी  हुई मंगलमयी मर्यादाओं की स्थापना करके रमणीय वन में प्रवेश करेंगे।

इस  प्रकार  सर्वभूतात्मा  सर्वेश्वर  भगवान्  कल्कि  के  अवतरित  होने  पर  पृथ्वी पर पुनः सत्ययुग प्रतिष्ठित होगा।

कहाँ होगा भगवान कल्कि का जन्म?
कल्कि भगवान उत्तर प्रदेश में गंगा और रामगंगा के बीच बसे मुरादाबाद के सम्भल ग्राम में जन्म लेंगे। भगवान के जन्म के समय चन्द्रमा धनिष्ठा नक्षत्रा और कुंभ राशि में होगा। सूर्य तुला राशि में स्वाति नक्षत्रा में गोचर करेगा। गुरु स्वराशि धनु में और शनि अपनी उच्च राशि तुला में विराजमान होगा।

वह ब्राह्मण कुमार बहुत ही बलवान, बुद्धिमान और पराक्रमी होगा। मन में सोचते ही उनके पास वाहन, अस्त्र-शस्त्र, योद्धा और कवच उपस्थित हो जाएँंगे। वे सब दुष्टों का नाश करेंगे, तब सतयुग शुरू होगा। वे धर्म के अनुसार विजय पाकर चक्रवर्ती राजा बनेंगे।

कौन होंगे इनके माता-पिता?
अपने माता-पिता की पाँचवीं संतान होंगे। भगवान कल्कि के पिता का नाम विष्णुयश और माता का नाम सुमति होगा। पिता विष्णुयश का अर्थ हुआ, ऐसा व्यक्ति जो सर्वव्यापक परमात्मा की स्तुति करता लोकहितैषी है। सुमति का अर्थ है, अच्छे विचार रखने और वेद, पुराण और विद्याओं को जानने वाली महिला।

ऐसा होगा अंतिम अवतार कल्कि भगवान का स्वरूप
कल्कि निष्कलंक अवतार हैं। भगवान का स्वरूप (सगुण रूप) परम दिव्य है। दिव्य अर्थात दैवीय गुणों से सम्पन्न। वे सफेद घोड़े पर सवार हैं। भगवान का रंग गोरा है, लेकिन गुस्से में काला भी हो जाता है। वे पीले वस्त्रा धारण किए हैं। प्रभु के हृदय पर श्रीवत्स का चिन्ह अंकित है। गले में कौस्तुभ मणि है। स्वंय उनका मुख पूर्व की ओर है तथा अश्व दक्षिण में देखता प्रतीत होता है।

यह चित्राण कल्कि की सक्रियता और गति की ओर संकेत करता है। युद्ध के समय उनके हाथों में दो तलवारें होती हैं। कल्कि को माना गया है। पृथ्वी पर पाप की सीमा पार होने लगेगी तब दुष्टों के संहार के लिए विष्णु का यह अवतार प्रकट होगा। भगवान का ये अवतार दिशा धारा में बदलाव का बहुत बड़ा प्रतीक होगा।

मनीषियों ने कल्कि के इस स्वरूप की विवेचना में कहा है कि कल्कि सफेद रंग के घोड़े पर सवार हो कर आततायियों पर प्रहार करते हैं। इसका अर्थ उनके आक्रमण में शांति (श्वेत रंग), शक्ति (अश्व) और परिष्कार (युद्ध) लगे हुए हैं। तलवार और धनुष को हथियारों के रूप में उपयोग करने का अर्थ है कि आसपास की और दूरगामी दोनों तरह की दुष्ट प्रवृत्तियों का निवारण करेगें अर्थात भगवान धरती पर से सारे पापों का नाश करेगें।

श्रीमद्भागवत के अभिन्न अंग भगवान श्री कल्कि क्यों?
शुकदेव जी (वैशम्पायन, व्यास जी के पुत्र) पाण्डवों के एकमात्र वंशज अभिमन्यु पुत्र परीक्षित (विष्णुपुराण) को, जो उपदेश (कथा) सुना रहे थे वह अठारह (18) हजार श्लोकों  का समावेश था।

महाराज परीक्षित का सात-दिन में निधन हो जाने से उन सारे श्लोकों का उपदेश न हो पाया था। अतः बाद में मार्कण्डेय ऋशि के आग्रह पर शुकदेव जी ने पुण्याश्रम में उसे पूरा किया था।

सूत जी (व्यास जी के शिष्य  हर्षण सूत के नाम से प्रसिद्ध हुए, जिनकी धारणा शक्ति से संहितायें दे दी) का कहना है कि वे भी वहाँ उपस्थित थे और पुण्यप्रद कथाओं को सुना था। सूत जी ने उन ऋषियों  को, जो कथा सुनाई वही श्री कल्कि पुराण के नाम से प्रसिद्ध है।

बदरीनाथ स्वामी जी 10 बातें

1:

बद्रीनाथ धाम उत्तराखंड के साथ ही साथ देश के चार धामों में से भी एक है। इस धाम के बारे में यह कहावत है कि ‘जो जाए बदरी, वो ना आए ओदरी’ यानी जो व्यक्ति बद्रीनाथ के दर्शन कर लेता है उसे पुनः माता के उदर यानी गर्भ में फिर नहीं आना पड़ता है। इसलिए शास्त्रों में बताया गया है कि मनुष्य को जीवन में कम से कम एक बार बद्रीनाथ के दर्शन जरूर करना चाहिए।

2:

यह है ब्रदीनाथ के चरण पखरती अलकनंदा। पुराणों में बताया गया है कि बद्रीनाथ में हर युग में बड़ा परिवर्तन। सतयुग तक यहां पर हर व्यक्ति को भगवान विष्णु के साक्षात दर्शन हुआ करते थे। त्रेता में यहां देवताओं और साधुओं को भगवान के साक्षात् दर्शन मिलते थे। द्वापर में जब भगवान श्री कृष्ण रूप में अवतार लेने वाले थे उस समय भगवान ने यह नियम बनाया कि अब से यहां मनुष्यों को उनके विग्रह के दर्शन होंगे। तब से भगवान के उस विग्रह के दर्शन प्राप्त होते हैं।

3:

बद्रीनाथ को शास्त्रों और पुराणों में दूसरा बैकुण्ठ कहा जाता है। एक बैकुण्ठ क्षीर सागर है जहां भगवान विष्णु निवास करते हैं और विष्णु का दूसरा निवास बद्रीनाथ है जो धरती पर मौजूद है। बद्रीनाथ के बारे यह भी माना जाता है कि यह कभी भगवान शिव का निवास स्थान था। लेकिन विष्णु भगवान ने इस स्थान को शिव से मांग लिया था।

4:

चार धाम यात्रा में सबसे पहले गंगोत्री के दर्शन होते हैं यह है गोमुख जहां से मां गंगा की धारा निकलती है। इस यात्रा में सबसे अंत में बद्रीनाथ के दर्शन होते हैं। बद्रीनाथ धाम दो पर्वतों के बीच बसा है। इसे नर नारायण पर्वत कहा जाता है। कहते हैं यहां पर भगवान विष्णु के अंश नर और नारायण ने तपस्या की थी। नर अगले जन्म में अर्जुन और नारायण श्री कृष्ण हुए।

5:

बद्रीनाथ की यात्रा में दूसरा पड़ाव यमुनोत्री है। यह है देवी यमुना का मंदिर। यहां के बाद केदारनाथ के दर्शन होते हैं। मान्यता है कि जब केदारनाथ और बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं उस समय मंदिर एक दीपक जलता रहता है। इस दीपक के दर्शन का बड़ा महत्व है। मान्यता है कि 6 महीने तक बंद दरवाजे के अंदर इस दीप को देवता जलाए रखते हैं।

6:

यह है जोशीमठ स्थित नृसिंह मंदिर। इस मंदिर का संबंध बद्रीनाथ से माना जाता है। ऐसी मान्यता है इस मंदिर भगवान नृसिंह की एक बाजू काफी पतली है जिस दिन यह टूट कर गिर जाएगा उस दिन नर नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे और बद्रीनाथ के दर्शन वर्तमान स्थान पर नहीं हो पाएंगे।

7:

बद्रीनाथ तीर्थ का नाम बद्रीनाथ कैसे पड़ा यह अपने आप में रोचक कथा है। कहते हैं एक बार देवी लक्ष्मी जब भगवान विष्णु से रूठ कर मायके चली गई तब भगवान विष्णु यहां आकर तपस्या करने लगे। जब देवी लक्ष्मी की नाराजगी दूर हुई तो भगवान विष्णु को ढूंढते हुए यहां आई। उस समय यहां बदरी का वन यानी बेड़ फल का जंगल था। बदरी के वन में बैठकर भगवान ने तपस्या की थी इसलिए देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को बद्रीनाथ नाम दिया।

8:

यह है सरस्वती नदी के उद्गम पर स्थित सरस्वती मंदिर जो बद्रीनाथ से तीन किलोमीटर की दूरी पर माणा गांव में स्थित है। सरस्वती नदी अपने उद्गम से महज कुछ किलोमीटर बाद ही अलकनंदा में विलीन हो जाती है। कहते हैं कि बद्रीनाथ भी कलियुग के अंत में वर्तमान स्थान से विलीन हो जाएंगे और इनके दर्शन नए स्थान पर होंगे जिसे भविष्य बद्री के नाम से जाना जाता है।

9:

यह है बद्रीनाथ का भव्य नजारा। मान्यता है कि बद्रीनाथ में में भगवान शिव को ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिली थी। इस घटना की याद दिलाता है वह स्थान जिसे आज ब्रह्म कपाल के नाम से जाना जाता है। ब्रह्मकपाल एक ऊंची शिला है जहां पितरों का तर्पण श्रद्घ किया जाता है। माना जाता है कि यहां श्राद्घ करने से पितरों को मुक्ति मिल जाती है।

10:

बद्रीनाथ के पुजारी शंकराचार्य के वंशज होते हैं जो रावल कहलाते हैं। यह जब तक रावल के पद पर रहते हैं इन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। रावल के लिए स्त्रियों का स्पर्श भी पाप माना जाता है।