बुधवार, 8 अगस्त 2018

सनातन संस्कृति

आखिर कितना पुराना है हिन्दू धर्म, क्या है इसका वास्तविक इतिहास जरुर जानिए:-

कुछ लोग हिन्दू संस्कृति की शुरुआत को सिंधु घाटी की सभ्यता से जोड़कर देखते हैं। जो गलत है। वास्तव में संस्कृत और कई प्राचीन भाषाओं के इतिहास के तथ्यों के अनुसार प्राचीन भारत में सनातन धर्म के इतिहास की शुरुआत ईसा से लगभग 13 हजार पूर्व हुई थीअर्थात आज से 15 हजार वर्ष पूर्व। इस पर विज्ञान ने भी शोध किया और वह भी इसे सच मानता है।

जीवन का विकास भी सर्वप्रथम भारतीय दक्षिण प्रायद्वीप में नर्मदा नदी के तट पर हुआ, जो विश्व की सर्वप्रथम नदी है। यहां पूरे विश्व में डायनासोरों के सबसे प्राचीन अंडे एवं जीवाश्म प्राप्त हुए हैं।

संस्कृत भाषा :- संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है तथा समस्त भारतीय भाषाओं की जननी है। ‘संस्कृत’ का शाब्दिक अर्थ है ‘परिपूर्ण भाषा’। संस्कृत से पहले दुनिया छोटी-छोटी, टूटी-फूटी बोलियों में बंटी थी जिनका कोई व्याकरण नहीं था और जिनका कोई भाषा कोष भी नहीं था। भाषा को लिपियों में लिखने का प्रचलन भारत में ही शुरू हुआ।
 
भारत से इसे सुमेरियन, बेबीलोनीयन और यूनानी लोगों ने सीखा। ब्राह्मी और देवनागरी लिपियों से ही दुनियाभर की अन्य लिपियों का जन्म हुआ। ब्राह्मी लिपि एक प्राचीन लिपि है जिसे देवनागरी लिपि से भी प्राचीन माना जाता है। हड़प्पा संस्कृति के लोग इस लिपि का इस्तेमाल करते थे, तब संस्कृत भाषा को भी इसी लिपि में लिखा जाता था।

जानें भाषाओं की मां “संस्कृत” से जुड़े हैरान कर देने वाले तथ्य

दुनिया का पहला धर्मग्रंथ :- जैन पौराणिक कथाओं में वर्णन है कि सभ्यता कोमानवता तक लाने वाले पहले तीर्थंकर ऋषभदेव की एक बेटी थी जिसका नाम ब्राह्मी था। उसी ने इस लेखन की खोज की। प्राचीन दुनिया में सिंधु और सरस्वती नदी के किनारे बसी सभ्यता सबसे समृद्ध, सभ्य और बुद्धिमान थी। इसके कई प्रमाण मौजूद हैं। यह वर्तमान में अफगानिस्तान से भारत तक फैली थी। प्राचीनकाल में जितनी विशाल नदी सिंधु थी उससे कहीं ज्यादा विशाल नदी सरस्वती थी। दुनिया का पहला धर्मग्रंथ सरस्वती नदी के किनारे बैठकर ही लिखा गया था।

पुरातत्त्वविदों के अनुसार यह सभ्यता लगभग 9,000 ईसा पूर्व अस्तित्व में आई थी, 3,000 ईसापूर्व उसने स्वर्ण युग देखा और लगभग 1800 ईसा पूर्व आते-आते किसी भयानक प्राकृतिक आपदा के कारण यह लुप्त हो गया। एक ओर जहां सरस्वती नदी लुप्त हो गई वहीं दूसरी ओर इस क्षेत्र के लोगों ने पश्चिम की ओर पलायन कर दिया।

जानिए सनातन हिन्दू धर्म में कुल कितने ग्रंथ हैं:-

हजारों वर्ष पहले के हिन्दू लोग :- सैकड़ों हजार वर्ष पूर्व पूरी दुनियाँ के लोग कबीले, समुदाय, घुमंतू वनवासी आदि में रहकर जीवन-यापन करते थे। उनके पास न तो कोई स्पष्ट शासन व्यवस्था थी और न ही कोई सामाजिक व्यवस्था। परिवार, संस्कार और धर्म की समझ तो बिलकुल नहीं थी। ऐसे में केवल भारतीय हिमालयन क्षेत्र में कुछ मुट्ठीभर लोग थे, जो इस संबंध में सोचते थे। उन्होंने ही वेद को सुना और उसे मानव समाज को सुनाया। उल्लेखनीय है कि प्राचीनकाल से ही भारतीय समाज कबीले में नहीं रहा। वह एक वृहत्तर और विशेष समुदाय में ही रहा।

सम्पूर्ण धरती पर हिन्दू वैदिक धर्म ने ही लोगों को सभ्य बनाने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक विचारधारा की नए-नए रूप में स्थापना की थी? आज दुनियाभर की धार्मिक संस्कृति और समाज में हिन्दू धर्म की झलक देखी जा सकती है चाहे वह यहूदी धर्म हो, पारसी धर्म हो या ईसाई-इस्लाम धर्म हो। क्योंकि ईसा से 2300-2150 वर्ष पूर्व सुमेरिया, 2000-400 वर्ष पूर्व बेबिलोनिया, 2000-250 ईसा पूर्व ईरान, 2000-150 ईसा पूर्व मिस्र (इजिप्ट), 1450-500 ईसा पूर्व असीरिया, 1450-150 ईसा पूर्व ग्रीस (यूनान), 800-500 ईसा पूर्व रोम की सभ्यताएं विद्यमान थीं।

परन्तु इन सभी से भी पूर्व अर्थात आज से 5000 वर्ष पहले महाभारत का युद्ध लड़ा गया था। महाभारत से भी पहले 7300 ईसापूर्व अर्थात आज से 7300+2000=9300 साल पहले रामायण का रचनाकाल प्रमाणित हो चुका है।

महाभारत काल में इस्तेमाल हुए ब्रहमास्त्र के सबूत, क्या कहते हैं वैज्ञानिक

मनुस्मृति :- अब चूँकि महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण में उससे भी पहले लिखी गई मनुस्मृति का उल्लेख आया है तो आइये अब जानते हैं रामायण से भी प्राचीन मनुस्मृति कब लिखी गई………!!!

किष्किन्धा काण्ड में श्री राम अत्याचारी बाली को घायल कर उन्हें दंड देने के लिए मनुस्मृति के श्लोकों का उल्लेख करते हुए उसे अनुजभार्याभिमर्श का दोषी बताते हुए कहते हैं- मैं तुझे यथोचित दंड कैसे ना देता ?
श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्र वत्सलौ ।।
गृहीतौ धर्म कुशलैः तथा तत् चरितम् मयाअ ।।
वाल्मीकि ४-१८-३०
राजभिः धृत दण्डाः च कृत्वा पापानि मानवाः ।
निर्मलाः स्वर्गम् आयान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ।।
वाल्मीकि ४-१८-३१
शसनात् वा अपि मोक्षात् वा स्तेनः पापात् प्रमुच्यते ।
राजा तु अशासन् पापस्य तद् आप्नोति किल्बिषम् ।
वाल्मीकि ४-१८-३२
उपरोक्त श्लोक ३० में मनु का नाम आया है और श्लोक
३१ , ३२ भी मनुस्मृति के ही हैं एवं उपरोक्त सभी श्लोक मनु अध्याय ८ के है ! जिनकी संख्या कुल्लूकभट्ट कि टीकावली में ३१८ व ३१९ है।
अतः यह सिद्ध हुआ कि श्लोकबद्ध मनुस्मृति जो महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण में अनेकों स्थान पर आयी है….वो मनुस्मृति रामायणकाल (9300 साल) के भी पहले विधमान थी ।

मनुस्मृति के विदेशी प्रमाण :- अब आईये विदेशी प्रमाणों के आधार पर जानते हैं कि रामायण से भी पहले की मनुस्मृति कितनी प्राचीन है..??

सन १९३२ में जापान ने बम विस्फोट द्वारा चीन की ऐतिहासिक दीवार को तोड़ा तो उसमे से एक लोहे का ट्रंक मिला जिसमे चीनी भाषा की प्राचीन पांडुलिपियां भरी थी । वे हस्तलेख Sir Augustus Fritz George के हाथ लग गयीं। वो उन्हें लंदन ले गये और ब्रिटिश म्युजियम में रख दिया । उन हस्तलेखों को Prof. Anthony Graeme ने चीनी विद्वानो से पढ़वाया।

चीनी भाषा के उन हस्तलेखों में से एक में लिखा है –
‘मनु का धर्मशास्त्र भारत में सर्वाधिक मान्य है जो वैदिक संस्कृत में लिखा है और दस हजार वर्ष से अधिक पुराना है’ तथा इसमें मनु के श्लोकों कि संख्या 630 भी बताई गई है। यही विवरण मोटवानी कि पुस्तक ‘मनु धर्मशास्त्र : ए सोशियोलॉजिकल एंड हिस्टोरिकल स्टडीज’ पेज २३२ पर भी दिया है । इसके अतिरिक्त R.P. Pathak कि Education in the Emerging India में भी पेज १४८ पर है।

अब देखें चीन की दीवार के बनने का समय लगभग 220–206 BC है अर्थात लिखने वाले ने कम से कम 220BC से पूर्व ही मनु के बारे में अपने हस्तलेख में लिखा 220+10000 =10220 ईसा पूर्व यानी आज से कम से कम 12,220 वर्ष पूर्व तक भारत में मनुस्मृति पढ़ने के लिए उपलब्ध थी ।

मनुस्मृति में सैकड़ों स्थानों पर वेदों का उल्लेख आया है। अर्थात वेद मनुस्मृति से भी पहले लिखे गये। अब हिन्दू धर्म के आधार वेदों की प्राचीनता जानते हैं-

वेदों की उत्पत्ति कब हुई ?

वेदों का रचनाकाल इतना प्राचीन है कि इसके बारे में सही-सही किसी को ज्ञात नहीं है। पाश्चात्य विद्वान वेदों के सबसे प्राचीन मिले पांडुलिपियों के हिसाब से वेदों के रचनाकाल के बारे में अनुमान लगाते हैं। जो अत्यंत हास्यास्पद है। क्योंकि वेद लिखे जाने से पहले हजारों सालों तक पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाए जाते थे। इसीलिए वेदों को “श्रुति” भी कहा जाता है। उस काल में भोजपत्रों पर लिखा जाता था अत: यदि उस कालखण्ड में वेदों को हस्तलिखित भी किया गया होगा तब भी आज हजारों साल बाद उन भोजपत्रों का मिलना असम्भव है।

अद्भुत, वेदों में छुपा है बरमूडा ट्रायंगल का अनसुलझा रहस्य

फिर भी वेदों पर सबसे अधिक शोध करने वाले स्वामी दयानंद जी ने अपने ग्रंथों में ईश्वर द्वारा वेदों की उत्पत्ति का विस्तार से वर्णन किया हैं. ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के पुरुष सूक्त (ऋक १०.९०, यजु ३१ , अथर्व १९.६) में सृष्टी उत्पत्ति का वर्णन है कि परम पुरुष परमात्मा ने भूमि उत्पन्न की, चंद्रमा और सूर्य उत्पन्न किये, भूमि पर भांति भांति के अन्न उत्पन्न किये,पशु पक्षी आदि उत्पन्न किये। उन्ही अनंत शक्तिशाली परम पुरुष ने मनुष्यों को उत्पन्न किया और उनके कल्याण के लिए वेदों का उपदेश दिया।

उन्होंने शतपथ ब्राह्मण से एक उद्धरण दिया और बताया-
‘अग्नेर्वा ऋग्वेदो जायते वायोर्यजुर्वेदः सूर्यात्सामवेदः शत.।।
प्रथम सृष्टि की आदि में परमात्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा इन तीनों ऋषियों की आत्मा में एक एक वेद का प्रकाश किया। (सत्यार्थ प्रकाश, सप्तम समुल्लास, पृष्ठ 135 इसलिए वेदों की उत्पत्ति का काल मनुष्य जाति की उत्पत्ति के साथ ही माना जाता है।

स्वामी दयानंद की इस मान्यता का समर्थन ऋषि मनु और ऋषि वेदव्यास भी करते हैं। परमात्मा ने सृष्टी के आरंभ में वेदों के शब्दों से ही सब वस्तुओं और प्राणियों के नाम और कर्म तथा लौकिक व्यवस्थाओं की रचना की हैं. (मनुस्मृति १.२१)

स्वयंभू परमात्मा ने सृष्टी के आरंभ में वेद रूप नित्य दिव्यवाणी का प्रकाश किया जिससे मनुष्यों के सब व्यवहार सिद्ध होते हैं (वेद व्यास,महाभारत शांति पर्व २३२/२४)

कुल मिलाकर वेदों, सनातन धर्म एवं सनातनी परम्परा की शुरूआत कब हुई। ये अभी भी एक शोध का विषय है। इसका मतलब कि हजारों वर्ष ईसा पूर्व भारत में एक पूर्ण विकसित सभ्यता थी। और यहाँ के लोग पढ़ना-लिखना भी जानते थे। इसके बाद भारतीय संस्कृति का प्रकाश धीरे-धीरे पूरे विश्व में फैलने लगा। तब भारत का ‘धर्म’ ‍दुनियाभर में अलग-अलग नामों से प्रचलित था।

हिन्दू धर्म के 5 ऐसे रहस्य, जिन्हें आजतक कोई नहीं सुलझा सका है

अरब और अफ्रीका में जहां सामी, सबाईन, ‍मुशरिक, यजीदी, अश्शूर, तुर्क, हित्ती, कुर्द, पैगन आदि इस धर्म के मानने वाले समाज थे तो रोम, रूस, चीन व यूनान के प्राचीन समाज के लोग सभी किसी न किसी रूप में हिन्दू धर्म का पालन करते थे। फिर ईसाई और बाद में दुनियाँ की कई सभ्यताओं एवं संस्कृतियों को नष्ट करने वाले धर्म इस्लाम ने इन्हें विलुप्त सा कर दिया।

मैक्सिको में ऐसे हजारों प्रमाण मिलते हैं जिनसे यह सिद्ध होता है। जीसस क्राइस्ट्स से बहुत पहले वहां पर हिन्दू धर्म प्रचलित था। अफ्रीका में 6,000 वर्ष पुराना एक शिव मंदिर पाया गया और चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया, लाओस, जापान में हजारों वर्ष पुरानी विष्णु, राम और हनुमान की प्रतिमाएं मिलना इस बात का सबूत है कि हिन्दू धर्म संपूर्ण धरती पर था।

गुरुवार, 24 मई 2018

शूर्पणखा और रावण

शूर्पणखा भी चाहती थी रावण का सर्वनाश, जानिए रामायण से जुड़ी ऐसी ही कुछ रोचक बातें:

सनातन धर्म में रामायण का महत्व सर्वविदित है.. ये सिर्फ एक पौराणिक कथा नही बल्कि जीवन का सार है। मूल कथा के साथ इसमे वर्णित हर प्रसंग बेहद अनमोल है जबकि हममें से अधिकांश लोग उनके बारे में नही जानते हैं। दरअसल श्रीराम का वनवास, सीता का हरण और रावण वध जैसे प्रमुख घटनाए तो हर कोई जानता है पर कई सारे ऐसे प्रसंग भी जिनसे लोग अनभिज्ञ हैं और आज हम आपको ऐसी ही अनसुनी और रोचक बातों के बारे में बताने जा रहे हैं।

असल में भगवान राम को समर्पित कई ग्रन्थ लिखे गए है पर उन सब में वाल्मीकि रचित रामायण सबसे प्रामाणिक मानी जाती है और रामायण से जुड़ी कुछ ऐसी बातें हैं जिनका वर्णन केवल वाल्मीकि कृत रामायण में है। हम आपको वाल्मीकि रचित रामायण के कुछ बातों के बारे में बताने जा रहे हैं।

आज तक हम यही सुनते आ रहे हैं कि सीता का भव्य स्वयंवर आयोजित हुआ था जिसको श्रीराम ने जीता था पर आपको बता दें कि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में सीता स्वयंवर का कोई वर्णन नहीं है। जी हां, वाल्मीकि कृत रामायण के अनुसार अपने गुरू ऋषि विश्वामित्र के साथ भगवान राम व लक्ष्मण मिथिला पहुंचे थे और वहां विश्वामित्र ने ही राजा जनक से श्रीराम को वह शिवधनुष दिखाने के लिए कहा और तब श्रीराम ने जैसे ही उस धनुष देखने के लिए उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाया तो वह टूट गया। चूंकि राजा जनक ने यह प्रण किया था कि जो भी उस शिव धनुष को उठा कर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा उससे ही वे अपनी पुत्री सीता का विवाह करेंगे. ऐसे में जनक ने सीता का विवाह श्रीराम के साथ कर दिया।

रावण को मिले उस श्राप के विषय में तो आपने सुना होगा जिसकी वजह से उसे किसी पराई स्त्री को उसकी इच्छा के बिना स्पर्श करने पर सर्वनाश होने की चेतावनी मिली थी । उस प्रसंग के बारे में तरह-तरह की मान्यताएं प्रचलित है लेकिन वाल्मीकि के रामायण में उसके बारे में ये लिखा गया है कि जब विश्व विजय करने की मंशा लिए रावण स्वर्ग लोक पहुंचा तो वहां उसे अप्सरा रंभा दिखाई पड़ा और उसकी नियत खराब हो गई। उसने अपनी वासना पूरी करने के लिए रम्भा को पकड़ लिया। तब रम्भा ने बताया कि आप मेरे साथ ऐसा अनाचार ना करें क्योंकि इस समय मैं आपके बड़े भाई कुबेर के बेटे नलकुबेर की सेवा में हूं और इस तरह मैं आपके लिए पुत्रवधू के समान हूं, लेकिन रम्भा के ये कहने पर भी रावण नहीं माना और रंभा से दुराचार किया। ऐसे में जब ये बात नलकुबेर को पता चली तो उसने उसी क्षण रावण को श्राप दे दिया कि आगे से अगर रावण ने किसी पराई स्त्री को बिना उसकी इच्छा के उसे स्पर्श किया तो उसका मस्तक सौ टुकड़ों में खंडित हो जाएगा।

शूर्पणखा के बारे में तो आप जानते ही हैं जिसके लिए रावण ने श्रीराम से बैर पाल लिया था पर क्या आपको पता है कि शूर्पणखा स्वयं भी रावण का विनाश ही चाहती थी। दरअसल रावण की बहन शूर्पणखा का पति था  विद्युतजिव्ह, जो कि कालकेय नाम के राजा का सेनापति था और जब रावण जब विश्व विजय के लिए निकला तो उसका युद्ध कालकेय से भी हुआ था. उसी युद्ध में रावण ने शूर्पणखा के पति विद्युतजिव्ह का वध कर दिया। इससे क्रोधित होकर शूर्पणखा ने उसी समय मन ही मन रावण को श्राप दे दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा।

कैकयी को दिए वचन के कारण राजा दशरथ को श्रीराम को ना चाह कर भी वनवास जाने का आदेश देना पड़ा था। पर वो किसी भी स्थिति में राम को खुद से दूर और वनवास नही जाने देना चाहते थे पर चूंकि वो वचनबद्ध थे। इसलिए जब राम को रोकने का कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने श्रीराम से आग्रह किया कि तुम मुझे बंदी बनाकर स्वयं राजा बन जाओ।

ये तो आप जानते ही है रावण ने कैसे तीनो लोक पर विजय पाने के लिए देवताओं से युद्ध किया था लेकिन क्या आपको ये पता है कि उसने यमराज से भी युद्ध किया था। जी हां, वाल्मीकि रचित रामायण के अनुसार रावण जब विश्व विजय पर निकला तो वह यमलोक भी जा पहुंचा और वहां उसने यमराज को युद्ध की चुनौती दी और तब यमराज और रावण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। जिसमें यमराज ने रावण के प्राण लेने के लिए कालदण्ड का प्रयोग करना चाहा था पर ब्रह्मा जी ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया था क्योंकि रावण का वध किसी देवता के हाथों संभव नहीं था।

इस प्रसंग के बारे में शायद ही आप जानते होंगे कि जब रावण ने सीता का हरण कर उन्हे अपनी अशोक वाटिका में बंदी बला डाला तो उसी रात को ब्रह्मा जी के कहने पर देवराज इंद्र ने माता सीता को सम्बल देने के लिए खीर खिलाई थी। वाल्मीकि रचित रामायण के अनुसार देवराज ने पहले अशोक वाटिका में मौजूद सभी राक्षसों को मोहित कर सुला दिया और उसके बाद माता सीता को खीर अर्पित की, जिसके खाने से सीता मां की शांतचित हो गई।

सोमवार, 21 मई 2018

अशोक

पेड़-पौधों के अलग-अलग उपायों से भी घर-परिवार की धन संबंधी और अन्य परेशानियों को दूर किया जा सकता है। यहां जानिए एक ऐसे वृक्ष
के चमत्कारी उपाय, जो हमारे घर के आसपास
आसानी से मिल जाता है।

इस पेड़ के पत्तों को घर के दरवाजे पर लगाया जाता है। एक बार दरवाजे पर ये पत्ते लगा दिए
जाए तो छ: माह तक वे चमत्कारी असर दिखाते हैं। वंदनवार के रूप में लगाएं पत्तों को
ये चमत्कारी वृक्ष है अशोक।

अशोक के पत्ते घर के दरवाजे पर वंदनवार के रूप में लगाए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जिस घर के मुख्य द्वार पर अशोक के पत्तों की वंदनवार
लगी होती है।

वहां किसी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव नहीं होता है। घर का वातावरण पवित्र और सकारात्मक बना रहता है। इन पत्तों का उपयोग
सभी प्रकार के मांगलिक और धार्मिक कार्यों में मुख्य रूप से किया जाता है।

सदाबहार है अशोक

अशोक का वृक्ष सदाबहार है, हर मौसम में यह हरा-भरा रहता है। अशोक के पत्तों का उपयोग घर
की सजावट में और अन्य पूजन संबंधी कार्यों में किया जाता है। किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य अशोक के पत्तों की वंदनवार के बिना अधूरे
ही रहते हैं। इन पत्तों के कारण घर का वातावरण
भी धार्मिक और पवित्र दिखाई देता है।

रविवार, 20 मई 2018

जड़ है कमाल की औषधि

धतूरे की जड़ : अश्लेषा नक्षत्र में धतूरे की जड़ लाकर घर में रखें, घर में सर्प नहीं आएगा और आएगा भी तो कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा।

बेहड़े का पत्ता : पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में बेहड़े का पत्ता लाकर घर में रखें, घर ऊपरी हवाओं के प्रभाव से मुक्त रहेगा।

नीबू की जड़ : उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में नीबू की जड़ लाकर उसे गाय के दूध में मिलाकर निःसंतान स्त्री को पिलाएं, उसे  की प्राप्ति होगी।

चंपा की जड़ : हस्त नक्षत्र में चंपा की जड़ लाकर बच्चे के गले में बांधें, बच्चे की प्रेत बाधा तथा नजर दोष से रक्षा होगी।

चमेली की जड़ : अनुराधा नक्षत्र में चमेली की जड़ गले में बांधें, शत्रु भी मित्र हो जाएंगे।

काले एरंड की जड़ : श्रवण नक्षत्र में एरंड की जड़ लाकर निःसंतान स्त्री के गले में बांधें, उसे संतान की प्राप्ति होगी।

तुलसी की जड़ : पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र में तुलसी की जड़ लाकर मस्तिष्क पर रखें, अग्निभय से मुक्ति मिलेगी।

विल्व पत्र : अश्विनी नक्षत्र वाले दिन एक रंग वाली गाय के दूध में बेल के पत्ते डालकर वह दूघ निःसंतान स्त्री को पिलाने से उसे संतान की प्राप्ति होती है।

अपामार्ग की जड़ : अश्विनी नक्षत्र में अपामार्ग की जड़ लाकर इसे तावीज में रखकर किसी सभा में जाएं, सभा के लोग वशीभूत होंगे।

नागर बेल का पत्ता : यदि घर में किसी वस्तु की चोरी हो गई हो, तो भरणी नक्षत्र में नागर बेल का पत्ता लाकर उस पर कत्था लगाकर व सुपारी डालकर चोरी वाले स्थान पर रखें, चोरी की गई वस्तु का पला चला जाएगा।

संखाहुली की जड़ : भरणी नक्षत्र में संखाहुली की जड़ लाकर तावीज में पहनें तो विपरीत लिंग वाले प्राणी आपसे प्रभावित होंगे।

आक की जड़ : कोर्ट कचहरी के मामलों में विजय हेतु आर्द्रा नक्षत्र में आक की जड़ लाकर तावीज की तरह गले में बांधें।

दूधी की जड़ : सुख की प्राप्ति के लिए पुनर्वसु नक्षत्र में दूधी की जड़ लाकर शरीर में लगाएं।

शंख पुष्पी : पुष्य नक्षत्र में शंखपुष्पी लाकर चांदी की डिविया में रखकर तिजोरी में रखें, धन की वृद्धि होगी।

बरगद का पत्ता : अश्लेषा नक्षत्र में बरगद का पत्ता लाकर अन्न भंडार में रखें, भंडार भरा रहेगा।

शनिवार, 12 मई 2018

श्री राम जी की बहन शांता

श्रीराम की दो बहनें भी थी एक शांता और दूसरी कुकबी। हम यहां आपको शांता के बारे में बताएंगे।
अयोध्या के राजा चक्रवर्ती दशरथ और कौशल्या की पुत्री शांता थीं, लेकिन पैदा होने के कुछ वर्षों बाद कुछ कारणों से राजा दशरथ ने शांता को अंगदेश के राजा रोमपद को दे दिया था।

भगवान राम की बड़ी बहन का पालन-पोषण राजा रोमपद और उनकी पत्नी वर्षिणी ने किया, जो महारानी कौशल्या की बहन अर्थात राम की मौसी थीं।


इस संबंध में तीन कथाएं हैं:
पहली :वर्षिणी नि:संतान थीं तथा एक बार अयोध्या में उन्होंने हंसी-हंसी में ही बच्चे की मांग की। दशरथ भी मान गए। रघुकुल का दिया गया वचन निभाने के लिए शांता अंगदेश की राजकुमारी बन गईं। शांता वेद, कला तथा शिल्प में पारंगत थीं और वे अत्यधिक सुंदर भी थीं।

दूसरी :लोककथा अनुसार शांता जब पैदा हुई, तब अयोध्‍या में अकाल पड़ा और 12 वर्षों तक धरती धूल-धूल हो गई। चिंतित राजा को सलाह दी गई कि उनकी पुत्री शां‍ता ही अकाल का कारण है। राजा दशरथ ने अकाल दूर करने के लिए अपनी पुत्री शांता को वर्षिणी को दान कर दिया। उसके बाद शां‍ता कभी अयोध्‍या नहीं आई। कहते हैं कि दशरथ उसे अयोध्या बुलाने से डरते थे इसलिए कि कहीं फिर से अकाल नहीं पड़ जाए।

तीसरी कथा :कुछ लोग मानते थे कि राजा दशरथ ने शां‍ता को सिर्फ इसलिए गोद दे दिया था, क्‍योंकि वह लड़की होने की वजह से उनकी उत्‍तराधिकारी नहीं बन सकती थीं।

शान्ता का विवाह किससे हुआ, जानिए अगले पन्ने पर...

शांता का विवाह महर्षि विभाण्डक के पुत्र ऋंग ऋषि से हुआ। एक दिन जब विभाण्डक नदी में स्नान कर रहे थे, तब नदी में ही उनका वीर्यपात हो गया। उस जल को एक हिरणी ने पी लिया था जिसके फलस्वरूप ऋंग ऋषि का जन्म हुआ था।

एक बार एक ब्राह्मण अपने क्षेत्र में फसल की पैदावार के लिए मदद करने के लिए राजा रोमपद के पास गया, तो राजा ने उसकी बात पर ध्‍यान नहीं दिया। अपने भक्‍त की बेइज्‍जती पर गुस्‍साए इंद्रदेव ने बारिश नहीं होने दी, जिस वजह से सूखा पड़ गया। तब राजा ने ऋंग ऋषि को यज्ञ करने के लिए बुलाया। यज्ञ के बाद भारी वर्षा हुई। जनता इतनी खुश हुई कि अंगदेश में जश्‍न का माहौल बन गया। तभी वर्षिणी और रोमपद ने अपनी गोद ली हुई बेटी शां‍ता का हाथ ऋंग ऋषि को देने का फैसला किया।

दशरथ ने पुत्र की कामना से जब बुलाया अपने दामाद को...

राजा दशरथ और इनकी तीनों रानियां इस बात को लेकर चिंतित रहती थीं कि पुत्र नहीं होने पर उत्तराधिकारी कौन होगा। इनकी चिंता दूर करने के लिए ऋषि वशिष्ठ सलाह देते हैं कि आप अपने दामाद ऋंग ऋषि से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाएं। इससे पुत्र की प्राप्ति होगी।

दशरथ ने उनके मंत्री सुमंत की सलाह पर पुत्रकामेष्ठि यज्ञ में महान ऋषियों को बुलाया। इस यज्ञ में दशरथ ने ऋंग ऋषि को भी बुलाया। ऋंग ऋषि एक पुण्य आत्मा थे तथा जहां वे पांव रखते थे वहां यश होता था। सुमंत ने ऋंग को मुख्य ऋत्विक बनने के लिए कहा। दशरथ ने आयोजन करने का आदेश दिया।

पहले तो ऋंग ऋषि ने यज्ञ करने से इंकार किया लेकिन बाद में शांता के कहने पर ही ऋंग ऋषि राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करने के लिए तैयार हुए थे। 

शांता के आने से हुई अयोध्या में वर्षा, अगले पन्ने पर

दशरथ ने केवल ऋंग ऋषि (उनके दामाद) को ही आमंत्रित किया लेकिन ऋंग ऋषि ने कहा कि मैं अकेला नहीं आ सकता। मेरी पत्नी शांता को भी आना पड़ेगा। ऋंग ऋषि की यह बात जानकर राजा दशरथ विचार में पड़ गए, क्योंकि उनके मन में अभी तक दहशत थी कि कहीं शांता के अयोध्या में आने से फिर से अकाल नहीं पड़ जाए।

लेकिन जब पुत्र की कामना से पुत्र कामेष्ठि यज्ञ के दौरान उन्‍होंने अपने दामाद ऋंग ऋषि को बुलाया, तो दामाद ने शां‍ता के बिना आने से इंकार कर दिया।

तब पुत्र कामना में आतुर दशरथ ने संदेश भिजवाया कि शांता भी आ जाए। शांता तथा ऋंग ऋषि अयोध्या पहुंचे। शांता के पहुंचते ही अयोध्या में वर्षा होने लगी और फूल बरसने लगे। शांता ने दशरथ के चरण स्पर्श किए। दशरथ ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि 'हे देवी, आप कौन हैं? आपके पांव रखते ही चारों ओर वसंत छा गया है।' जब माता-पिता (दशरथ और कौशल्या) विस्मित थे कि वो कौन है? तब शांता ने बताया कि 'वो उनकी पुत्री शांता है।' दशरथ और कौशल्या यह जानकर अधिक प्रसन्न हुए। वर्षों बाद दोनों ने अपनी बेटी को देखा था।

दशरथ ने दोनों को ससम्मान आसन दिया और उन दोनों की पूजा-आरती की। तब ऋंग ऋषि ने पुत्रकामेष्ठि यज्ञ किया तथा इसी से भगवान राम तथा शांता के अन्य भाइयों का जन्म हुआ।

यज्ञ कराने से ऋंग ऋषि का पुण्य नष्ट हो गया तब उन्होंने क्या किया...

कहते हैं कि पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने वाले का जीवनभर का पुण्य इस यज्ञ की आहुति में नष्ट हो जाता है। इस पुण्य के बदले ही राजा दशरथ को पुत्रों की प्राप्ति हुई। राजा दशरथ ने ऋंग ऋषि को यज्ञ करवाने के बदले बहुत-सा धन दिया जिससे ऋंग ऋषि के पुत्र और कन्या का भरण-पोषण हुआ और यज्ञ से प्राप्त खीर से राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। ऋंग ऋषि फिर से पुण्य अर्जित करने के लिए वन में जाकर तपस्या करने लगे।

रामायण और रामचरित मानस में शांता के चित्र क्यों नहीं...

जनता के समक्षशान्ताने कभी भी किसी को नहीं पता चलने दिया कि वो राजा दशरथ और कौशल्‍या की पुत्री हैं। यही कारण है कि रामायण या रामचरित मानस में उनका खास उल्लेख नहीं मिलता है।

दुख तो तब हुआ शान्ता को जब कोई भाई मिलने नहीं आया...

कहते हैं कि जीवनभर शांता राह देखती रही अपने भाइयों की कि वे कभी तो उससे मिलने आएंगे, पर कोई नहीं गया उसका हाल-चाल जानने। मर्यादा पुरुषोत्तम भी नहीं, शायद वे भी रामराज्‍य में अकाल पड़ने से डरते थे।

कहते हैं कि वन जाते समय भगवान राम अपनी बहन के आश्रम के पास से भी गुजरे थे। तनिक रुक जाते और बहन को दर्शन ही दे देते। बिन बुलाए आने को राजी नहीं थी शांता। सती माता की कथा सुन चुकी थी बचपन में, दशरथ से।

अगले पन्ने पर कौन से राजपूत हैं ऋंग ऋषि के वंशज...

ऐसा माना जाता है कि ऋंग ऋषि और शांता का वंश ही आगे चलकर सेंगर राजपूत बना। 

विभीषण की माता कौशिल्या

विभीषण की माता कौसल्या और पिता दशरथ?
पहली कथा सुनने में मिलती है”:―
कि कैकसी राक्षसी और ऋषि विश्वश्रवा से उत्पन्न हुए रावण एवं कुंभकर्ण, ये दोनों पुत्र दुष्टकर्मा राक्षस थे। किंतु इन्हीं ऋषि के आशीर्वाद के कारण, कैकसी का तृतीय पुत्र विभीषण, अपने पिता के समान ब्राह्मण वंशीय एवं धर्मात्मा उत्पन्न हुए।

“अब दूसरी कथा को समझते हैं”:―
यह कथा भारत में नहीं अपितु श्रीलंका में विख्यात है। कहते हैं जब रावण को इस बात की जानकारी हुई की कौशिल्या का पुत्र उसकी और उसके परिवार की मृत्यु का कारण बनेगा, तब उसने अपने सैनिकों से कहकर कौशल प्रदेश के राजा कौशिक की पुत्री कौशिल्या जी को विवाह मंडप से अपहरण करवा कर उन्हें लंका के सिंहल द्वीप में सुरक्षित अपने निगरानी में रखता है।

एक बार दशरथ जी सिंहल द्वीप पहुंचे। वहां दशरथ जी का मिलन कौशल्या से हुआ। जिस कारण कौशिल्या जी गर्भवती हो जाती हैं। इधर दशरथ जी कौशिल्या जी से विवाह का प्रस्ताव रखते हैं। तब कौशिल्या जी कहती हैं इस समय मैं लंका के राजा रावण के संरक्षण में हूं। यदि वह आदेश देता है तो अवश्य आपसे विवाह करूंगी। यह सुनकर दशरथ जी अयोध्या वापस आ जाते हैं। समय बीतने पर जब कौशिल्या जी को पुत्र होता है तब कौशिल्या जी ने यह खबर दशरथ जी तक भिजवाया। यह सुन दशरथ जी सुमन्त जी को साथ लेकर तुरत चल पड़े, जब दशरथ जी कौशिल्या जी से मिलते हैं, तब कौशिल्या जी ने अपने पर बीती सारी बात बताई।

तब दशरथ जी ने विवाह करने का फ़ैसला लिया और इस प्रकार ब्राह्मण होने के कारण सुमन्त जी ने स्वयं दोनों का विवाह संस्कार सम्पन्न कराया। विवाह से पहले उत्पन्न संतान को समाज धर्म के कारण त्याग कर दिया, और अयोध्या वापस लौट आए।

विश्वश्रवा की पत्नी मालिनी एक गगन चरी थी। वह आकाश मार्ग से उड़ रही थी, तभी उसने उस बच्चे को देखा। भूख से व्याकुल होने के कारण बालक को निगल गई। विश्वश्रवा ने ध्यान लगाकर देखा तो इस बालक को योग बल के द्वारा अपने दूसरी पत्नी मालिनी के गर्भ में स्थापित किया और इस प्रकार विभीषण जी का जन्म हुआ। विश्वश्रवा ने अपनी पत्नी मालिनी को बताया है कि वह बालक राक्षस वंश का कुल दीपक होगा इसलिए इस बालक का जीवित रहना जरूरी है। आगे चलकर वह परमात्मा राम का भक्त होगा।

कथा का प्रसंग सटीक नहीं इस कथा में कई प्रश्न खड़े हो सकते हैं । जैसे कि भगवान श्री राम के पिता राजा चक्रवर्ती दशरथ कभी नन्हें शिशु को निर्जन द्वीप में त्याग कर जा ही नहीं सकते आदि आदि। इसलिए मेरी दृष्टि में यह कथा कपोल कल्पित है।

भविष्य में 14 रामायण रचे हुए हैं। कंबन रामायण से लेकर तुलसी कृत रामायण और  अध्यात्म रामायण में  प्राचीन कथाएं दी गई हैं। शास्त्र परंपरा के अनुसार विभीषण मालिनी का पुत्र हुआ, यह कथा स्वामी करपात्री जी की कथा में सुनी है।

रविवार, 11 मार्च 2018

कक्षीवान

एक बार कक्षीवान ऋषि प्रियमेध ऋषिके पास गए तथा बोले, `प्रियमेध, मेरी एक पहेली सुलझाओ । ऐसी कौन-सी वस्तु है जिसे जलानेपर प्रकाश नहीं उत्पन्न होता ?' प्रियमेधने बहुत सोचा; परन्तु वे पहेली नहीं सुलझा पाए । क्योंकि, किसी वस्तुको जलानेपर उससे थोडा तो भी प्रकाश उत्पन्न होता ही है । तब उन्होंने कहा, `मुझे इसका उत्तर नहीं ज्ञात है । परन्तु, आगे मेरे वंशमें कोई ऐसा विद्वान अवश्य जन्म लेगा, जो इसका उत्तर देगा ।'

कक्षीवान ऋषिके पास नेवलेके चमडेकी एक बडी-सी थैली थी । उस थैलीमें प्रियंगु (पिप्पली), चावल एवं अधिकता नामक अनाज भरा था । वे प्रतिवर्ष उसमेंसे एक-एक दाना निकालकर फेंक देते थे । अनाजके सभी दाने समाप्त होनेतक उन्हें जीवन प्राप्त था । परन्तु, प्रियमेधका जीवन कक्षीवान इतना नहीं था । उनके मरनेके पश्चात उनके पुत्रने उनका कार्य हाथमें लिया । आगे वह भी बूढा होकर मृत्युको प्राप्त हुआ । इस प्रकार, प्रियमेधके पश्चात नौवीं पीढीमें साकमश्वका जन्म हुआ ।

परन्तु, कक्षीवानकी अनाजकी थैलीमें अब भी दाने शेष थे, इसलिए वे जीवित रहकर अपनी पहेलीके उत्तरकी प्रतीक्षा कर रहे थे । अब उनकी अवस्था लगभग नौ सौ वर्ष हो गई थी । किन्तु, अभी भी उनकी पहेली नहीं सुलझ पायी थी ।

साकमश्वको इस पहेलीने व्याकुल कर दिया था । उसने निश्चय किया कि मैं इस पहेलीको सुलझाऊंगा । उसी समय उसे एक `साम' सूझा । उसने वह साम गाया और पहेलीका उत्तर मिल गया ।

तब, वह तुरन्त बडे आनन्दके साथ कक्षीवानके पास गया । कक्षीवानने उसे दूरसे ही दौडकर आते देखा, तो उन्हें उसके दौडकर आनेका कारण समझमें आ गया । उन्होंने अपने शिष्यसे कहा, `अरे, मेरी यह थैली नदीमें छोड दो । मेरी पहेली सुलझाकर मुझे झुकानेवाला मनुष्य मुझे दिखाई दे रहा है । अब जीनेसे कोई लाभ नहीं ।'

`साकमश्व कक्षीवानके निकट आकर बोला, `जो मनुष्य केवल `ऋचा' गाता है, `साम' नहीं गाता, उसका गायन उस अग्नि जैसा है; जिससे प्रकाश नहीं उत्पन्न होता । परन्तु, जो `ऋचा' के पश्चात तुरन्त `साम' भी गाता है, उसका गायन उस अग्नि-जैसा है, जिससे प्रकाश भी उत्पन्न होता है । साकमश्वको जब `साम'का स्फुरण हुआ तथा उसने उसे गाया, तब उसे `साम'के तेजकी अनुभूति हुई । संगीतरहित मन्त्रपठनसे कोई लाभ नहीं है, यह उसने खोज निकाला था ।

साकमश्वने आगे कहा, `यह मेरा उत्तर है । मेरे पिताका भी यही उत्तर है ।' ऐसा कहकर उसने प्रियमेधतक अपने सभी पूर्वजोंके नाम लिए तथा अपने पूर्वजोंका कलंक धो दिया ।

तबसे, यज्ञमें ऋग्वेदकी ऋचाओंके साथ सामवेदके सामका भी गायन आरम्भ हुआ एवं काव्यको संगीतका साथ मिला ।