मंगलवार, 5 अगस्त 2014

शुभ मुहूर्त देखना


शुभ मुहूर्त
भूमि। प्लाट क्रय  विक्रय मुहूर्त :-  भूमि एवं प्लाट खरीदने या बेचने हेतु वैशाख , ज्येष्ठ, अषाढ़ , मार्गशीर्ष, माघ, व फाल्गुन मास की द्वितीय, पंचमी, षष्ठी, दशमी, एकादशी  व पूर्णिमा तिथि में बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार, शनिवार, रविवार, सोमवार, अदि वारों में मृगशिरा, अश्लेशा, मघा, विशाखा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद, मूल, रेवती, उत्तराषाढ़,  उत्तराभाद्रपद, हस्त, चित्रा, स्वाति, शतभिषा, नक्षत्र उत्तम रहते हैं ।
सिद्ध योग देखना:
अगर शुक्रवार को नंदा तिथि पड़ती हो, बुधवार को भद्रा तिथि पड़ती हो, शनिवार को रिक्त तिथि पड़ती हो, मंगलवार को जया तिथि  पड़ती हो  तथा  गुरूवार को पूर्णा तिथि पड़ती हो तो उस दिन सिद्ध मुहूर्त होता है । नंदा तिथि, भद्रा तिथि, रिक्ता तिथि, जया तिथि  तथा पूर्णा तिथि के बारे में जानने के लिए कृपया पंचांग एवं कलेंडर के वेबपेज पर देखें ।
मृत्यु योग देखना:
अगर रविवार व मंगलवार को नंदा तिथि पड़ती हो, सोमवार व शुक्रवार को भद्रा तिथि पड़ती हो, गुरूवार को रिक्ता तिथि पड़ती हो, शनिवार को पूर्णा तिथि पड़ती हो, तथा बुधवार, को जया तिथि पड़ती हो तो मृत्यु योग बनता है। नंदा तिथि, भद्रा तिथि, रिक्ता तिथि, जया तिथि  तथा पूर्णा तिथि के बारे में जानने के लिए कृपया पंचांग एवं कलेंडर के वेबपेज पर देखें।
सामग्री खरीदने बेचने का मुहूर्त:
तीनों पूर्वा, विशाखा, भरनी, कृतिका, अश्लेषा, नक्षत्र तथा शुभ दिन शुक्र, गुरु, सोमवार, बुधवार, आदि इन वारों में वस्तु या चीज को बेचना चाहिये। तथा चित्रा, रेवती, स्वाति, शतभिषा, अश्विनी, धनिष्ठा, श्रवण  नक्षत्रों में  एवं और गुरूवार, शुकवार, सोमवार, बुधवार, इन वारों में वस्तु या चीज खरीदना चाहिये  यह शुभ रहता है ।
औषधि या इलाज कराने या दवाई शुरू करने का मुहूर्त
रेवती, अश्विनी, पुनर्वशु, पुष्य, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, अनुराधा, मूल, मृगशिरा, इन नक्षत्रों में दवाई या इलाज शुरू करने से जल्दी रोग दूर हो जाता है एवं शुभ रहता है ।
कुआ पूजने का मुहूर्त:
कुआ पूजन वर्ष के चैत्र, पौष, मास तथा पुरसोत्तम मास को छोड़कर सभी महीनों की २, ३, ५, ६, ७, ८, १०, ११, १२, १३, एवं पूर्णिमा तिथियों को  तथा सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुभ वार रहते हैं । मूल, श्रवण, मृगशिरा, पुनर्वशु, पुष्य, हस्त, अनुराधा, आदि नक्षत्र शुभ रहते हैं।तथा मेष, कर्क, सिंह,तुला, व मकर, लग्न शुभ रहते हैं ।

गृह आरम्भ करने या नींव धरने का मुहूर्त:-गृह आरम्भ करने या नींव धरने  के लिए शुभ तिथि , वार, नक्षत्र, लग्न आदि निम्न प्रकार से हैं :-
शुभ महीने: श्रावण , वैशाख, कार्तिक, मार्गशीर्ष, फाल्गुन मास नींव धरने के लिए उत्तम रहते हैं ।
शुभ तिथियाँ : उपरोक्त सभी महीनों की शुभ तिथि , २, ३, ५, ६, ७, १०, ११, १२, १२, एवं पूर्णिमा  तिथि नीवं धरने के लिए शुभ रहती हैं । शुभ वार : सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार, व शनिवार, आदि उत्तम रहते हैं।
शुभ नक्षत्र: मृगशिरा, रेवती, शतभिषा, चित्रा, पुष्य, अनुराधा, रोहिणी, तीनो उत्तरा, हस्त, स्वाति व धनिष्ठा नक्षत्र उत्तम रहते हैं । शुभ लग्न : वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ, आदि की स्थिर लग्न । उपरोक्त सभी घटकों में नींव धरना या गृह आरम्भ करना शुभ रहता है ।
गृह प्रवेश मुहूर्त:
गृह प्रवेश उत्तरायण काल में शुभ रहता है । गृह प्रवेश वैशाख , ज्येष्ठ, मार्गशीर्ष, माघ,एवं फाल्गुन  मास , इन सभी महीनों की २, ३, ५, ६, ७, १०, ११, १३, एवं पूर्णिमा  तिथि  व सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार, व शनिवार, शुभ रहते हैं ।
शुभ नक्षत्र: रोहिणी, मृगशिरा, तीनो, उत्तरा, चित्रा, अनुराधा, व रेवती, तथा जन्म लग्न से ३, ६, १०, ११ वें पड़ने वाली स्थिर लग्न शुभ रहती हैं।
चुनाव लड़ने के लिए नामांकन भरना व शपथ लेने के लिए मुहूर्त पंच, सरपंच, पार्षद, प्रधान, विधान सभा, लोक सभा, राष्ट्रपति, अध्यक्ष  आदि के लिए चुनाव लड़ने के लिए नामांकन भरने के लिए  तथा  जीतने पर शपथ ग्रहण करने  आदि के लिए शुभ मुहूर्त जरूरी होता है । इसके लिए शुभ मुहूर्त के लिए शुभ तिथियाँ: २, ३, ५, ९, १०, १२, तथा पूर्णिमा तिथि अच्छी रहती हैं । 
शुभ वार:  सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार, शुभ रहते हैं ।
शुभ नक्षत्र:  अश्विनी, रोहिणी, पुनर्वशु, पुष्य, तीनों उत्तरा , हस्त, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, रेवती, उपरोक्त नक्षत्र  मुहूर्त के लिए शुभ रहते हैं।
शुभ लग्न: मेष, कर्क, तुला, मकर, लग्न शुभ रहती हैं ।  

ऐसे करें गणेश आराधना..अवश्य होगा लाभ—


एह्येहि हेरंब महेशपुत्र समस्त विघ्नौद्या विनाशदक्ष

मांगल्य पूजा प्रथम प्रधान गृहाण पूजां भगवन नमस्ते।।

हे महेशपुत्र समस्त विघ्नों के विनाश करने वाले देवाधिदेव मांगल्य कार्यों में प्रधान प्रथम पूज्य गजानन, गौरी पुत्र आपको नमस्कार है।

गजानन, गौरी पुत्र, महेश पुत्र, एकदंत, वक्रतुंड, विनायक, लंबोदर, भालचंद्र ऐसे नाना प्रकार के नामों से पूज्य श्री गणेशजी की आराधना जो भक्त भाद्रपद शुक्ल पक्ष की गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक करता है। उस भक्त के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्‍ट हो जाते हैं एवं उसकी हर मनोकामना गणेशजी पूर्ण करते है।
जितने भी ग्रह-नक्षत्र, राशियां है उनको गणेशजी का अंश माना गया है। यह सत्य है। मन, कर्म, वचन से जो गणेशजी की आराधना करता है, अनुष्‍ठान करता है, उस पर गणेशजी की विशेष अनुकंपा होती है।
गणेशजी की आराधना विद्यार्थी विद्या प्राप्ति के लिए करें, जिसको धन पाना है वह धन प्राप्ति के लिए, मोक्ष पाने वाला मोक्ष प्राप्ति के लिए, पुत्र की कामना वाले व्यक्ति पुत्र प्राप्ति के लिए करें, रिद्धि-सिद्धि के दाता भगवान गणेश सभी प्रकार के भक्तों की इच्छा अवश्‍य पूर्ण करते हैं। भगवान गणेश की आराधना सच्चे मन से करने पर हर मनोरथ पूर्ण होंगे।
विद्यार्थी लभते विद्यां, धनार्थी लभते धनम्

प‍ुत्रार्थी लभते पुत्रान्, मोक्षार्थी लभते गतिम्।।

देवताओं के भी पूज्य गजानन जी को यक्ष, दानव, किन्नर जो भी पूजता है। वह सुख-संपदा, राज्य भोग, सब प्राप्त कर लेता है। यदि मनुष्य सच्चे दिल से गौरी पुत्र का स्मरण करें तो अवश्य ही समस्त सिद्धियों का ज्ञाता एवं पराक्रमी होता है। श्री गणेश जी के स्त्रोत को जो नित्य जपता है, वह अवश्‍य ही वांछित फल पाता है। इसमें संशय नहीं है।
नमो व्रातपतये नमो गणपतये
नम: प्रथमपतये नमोस्तेतु लंबोदरायैकदन्ताय
विघ्नविनाशिने शिवसुताय श्री वरदमूर्तये नमो नम: ।।
गजानन गणपति को बार-बार नमस्कार है। हे विघ्न विनाश करने वाले, लंबोदर, एकदंत, प्रथमपूज्य, शिवसुताय इस भक्त का प्रणाम स्वीकार करो। इस प्रकार गणेशजी से प्रार्थना करें। वह अवश्‍य आपके मनोरथ पूर्ण करेंगे।

हुताशन योग

अब तक के अध्ययन से आप जान चुके हैं कि तिथि और वार के संयोग से किस प्रकार भिन्न भिन्न योगों का  निर्माण होता है। आइये इस क्रम को जारी रखते हुए हम अगले योग की बात करें जिसका नाम है। हुताशन नामक यह योग भी अशुभ फलदायी है। यह योग किस प्रकार से बनता है व इसका क्या पभाव है आइये इसे समझें।

हुताशन योग बनने के लिए तिथि और वार में किस प्रकार का संयोग होना चाहिए अर्थात हुताशन योग कैसे बनता है आइये पहले इसे जानलें
१.रविवार का दिन हो और तिथि हो द्वादशी,  इस बार और तिथि का संयोग होने पर हुताशन योग बनेगा
२.दिन हो सोमवार का और तिथि हो षष्टी तब यह अशुभ योग बनता है।
३.जब मंगल के दिन सप्तमी तिथि पड़े तब इस योग का निर्माण होता है। 
४.अष्टमी तिथि जब बुधवार के दिन पड़ता है तब हुताशन योग बनता है। 
५.तिथि हो नवमी और दिन हो गुरूवार का तो इस संयोग का फल हुताशन योग होता है।
६.शुक्रवार के दिन जब कभी दशमी तिथि पड़ जाती है तब भी, हुताशन योग बनाता है
७.शनिवार के दिन जब एकादशी तिथि हो तब आपको कोई शुभ काम करने की इज़ाजत नहीं दी जाती है क्योंकि यह अशुभ विष योग का निर्माण करती है। 

विषयोग

जन्मपत्रिका में जब शनि और चन्द्रमा कि युति हो तो बिस योग बन जाता है।
जब आपके ह्रदय में ऐसी इक्षा प्रकट हो कि अब आपका जीवन बिसमय हो गया, अब हमें जीने की इच्छा नहीं है। हम मरने का प्रयास करने लगें, तो इस समय आपको देखना चाहिए की कहीं आपकी पत्रिका में बिस योग तो नहीं, अगर शनि और चन्द्रमा की युती होती है तो जीवन में तनाव का योग बन जाता है, मानसिक​
अशान्ति का योग बन जाता है। क्योंकि मन के मालिक चन्द्रमा हैं, शरीर के अन्दर मन का ही तो प्रभाव रहता है, मन यदि कहता है कि आप राजा बन गये तो सचमुच आपके अन्दर राज सत्ता पाने की चाह प्रकट​
हो जाती है। परन्तु जब आपकी कुण्डली में बिस योग बनता है तो आपक मन सून्य हो जाता है, यदि यह योग बन रहा है तो इसका प्रभाव आपके कैरियर पर पड़ता है, किसी भी कार्य का आप डिसीजन ही नहीं ले
पायेंगे कि हम क्या करें ? आप यह भी सोच सकते है की आपसे अच्छा इन्शान दूसरा कोई नहीं है, आप जो 
कर रहे हैं वह अच्छा कर रहे हैं, लेटे लेटे आप यह सोचोगे की आपने बहुत बड़ी फैक्ट्री खड़ी करली है या बहुत बड़े व्यापारी बन गये हैं, ऐसे क​ई खयाली पुलाव पकाते रहेंगे। यह बिस योग आपके जीवन को भटकाओ का योग बना देता है। शनि विष योग एक ऐसा योग है जिससे जातक नकारात्मक सोच से घिर जाता है और बने बनाए काम बिगड़ जाते हैं

विषयोग की स्थिति: —
कुण्डली में विषयोग ) का निर्माण शनि और चन्द्र की स्थिति के आधार पर बनता है.शनि और चन्द्र की जब युति होती है तब अशुभ विषयोग बनता है. लग्न में चन्द्र पर शनि की तीसरी,सातवीं अथवा दशवी दृष्टि होने पर यह योग बनता है.कर्क राशि में शनि पुष्य नक्षत्र में हो और चन्द्रमा मकर राशि में श्रवण नक्षत्र का हो और दोनों का परिवर्तन योग हो या फिर चन्द्र और शनि विपरीत स्थिति में हों और दोनों की एक दूसरे पर दृष्टि हो तब विषयोग की स्थिति बनती है.सूर्य अष्टम भाव में, चन्द्र षष्टम में और शनि द्वादश में होने पर भी इस योग का विचार किया जाता है. कुण्डली में आठवें स्थान पर राहु हो और शनि मेष, कर्क, सिंह या वृश्चिक लग्न में हो तो विषयोग भोगना होता है.विषयोग चंद्र-शनि से बनता है। दांपत्य जीवन तब नष्ट होता है जब सप्तम भाव या सप्तमेश से युति दृष्टि संबंध हो। जैसे सप्तम भाव में धनु राशि हो और सप्तम भाव में शनि हो और लग्न में गुरु-चंद्र हो तब यह दोष लगेगा या शनि-चंद्र सप्तम भाव में हो तब दांपत्य जीवन को प्रभावित करेगा। इसी प्रकार विस्फोटक योग शनि-मंगल से बनता है। यदि शनि-मंगल की युति सप्तम भाव में हो या शनि सप्तम भाव में हो व मंगल की दृष्टि पड़ती हो तो या शनि सप्तम भाव में बैठे मंगल पर दृष्टिपात करता हो या सप्तमेश शनि-मंगल से पीड़ित हो तो दांपत्य जीवन नष्ट होता है अन्यत्र हो तो दांपत्य जीवन नष्ट नहीं होता।जन्म पत्रिका में कितने भी शुभ ग्रह हों और इन योगों में से कोई एक भी योग बनता है तो सभी शुभ प्रभावों को खत्म कर देता है। यदि उपरोक्त योग जहाँ बन रहे हैं, उन पर यदि शुभ ग्रह जैसे गुरु की दृष्टि हो तो कुछ अशुभ परिणाम कम कर देता है।एक उदाहरण कुंडली से जानें कि उच्च का चंद्रमा एक युवती के लग्‍न में है अतः युवती सुंदर तथा गौर वर्ण तो है लेकिन इसका दांपत्य जीवन खराब है। सप्तमेश शुक्र द्वादश भाव में अग्नि तत्व की राशि मेष में बैठा है अतः दांपत्य जीवन खराब है एवं शनि की दसवीं दृष्टि चंद्रमा पर पड़ रही है, जो विष योग बना रही है अतः इसका सारा जीवन दुख व अभावों में बीतेगा, वहीं इसकी पत्रिका में राहू व केतु मध्य सारे ग्रह होने से कालसर्प योग भी बन रहा है, जो कष्टों को और अधिक प्रभावित कर रहा है। लग्न पर शनि के अलावा किसी शुभ ग्रह की दृष्टि भी नहीं है। उदाहरण कुंडली से पता चलता है कि किस प्रकार विषयोग जीवन पर प्रभाव डालता है।

यदि शनि-मंगल या शनि-चंद्र की युति सप्तम भाव में हो या आपसी दृष्टि संबंध बनता हो तो निश्चित ही दांपत्य जीवन नरक बन जाता है। शनि-मंगल की युति यदि चतुर्थ या दशम भाव में बनती हो तो ऐसा जातक माता सुख से, परिवार से, जनता के बीच आदि कार्यों से हानि पाता है, उसी प्रकार दशम भाव में बनने वाला योग पिता से, राज्य से, नौकरी से, व्यापार से, राजनीति से आदि मामलों से हानि पाता हैं।

ऐसा जातक नौकरी में भटकता रहता है, स्थानांतरण होते रहते हैं एवं अपने अधिकारियों से नहीं बनती। यदि शनि-मंगल की युति तृतीय भाव में हो तो भाइयों से नहीं बनती व मित्र भी दगा कर जाते हैं। साझेदारी में किए गए कार्यों में घाटा होता हैं। सूर्य-चंद्र की युति सदैव अमावस्या को ही होती है, इसे अमावस्या योग की संज्ञा दी गई है, यह योग भी जिसकी पत्रिका में जिस भाव में बनेगा, उस भाव को कमजोर कर देगा।

– अगर कोई नदी में कचरा या पूजन सामग्री फेंकता है उसे ज्योतिष के अनुसार विषयोग बनाता है और धन का नुकसान उठाना पड़ता है।
—विष योग किस प्रकार बनता है??॥ ज्योतिषशास्त्र के अनुसार विषयोग तब बनता है जब वार और तिथि के मध्य विशेष योग बनता है। जेसे—
–जब रविवार के दिन चतुर्थी तिथि पड़े तब इस योग का निर्माण होता है।
— सोमवार का दिन हो और षष्टी तिथि पड़े तब यह अशुभ योग बनता है।
—मंगलवार का दिन हो और तिथि हो सप्तमी, इस बार और तिथि के संयोग से भी विष योग बनता है।
—द्वितीया तिथि जब बुधवार के दिन पड़े तब विष योग का निर्माण होता है।
—अष्टमी तिथि हो और दिन हो गुरूवार का तो इस संयोग का फल विष योग होता है।
—शुक्रवार के दिन जब कभी नवमी तिथि पड़ जाती है तब भी विष योग बनाता है।
—शनिवार के दिन जब सप्तमी तिथि हो तब आपको कोई शुभ काम करने की इज़ाजत नहीं दी जाती है क्योंकि यह अशुभ विष योग का निर्माण करती है।

विषयोग में शनि चन्द्र की युति का फल: –

जिनकी कुण्डली में शनि और चन्द्र की युति प्रथम भाव में होती है वह व्यक्ति विषयोग के प्रभाव से अक्सर बीमार रहता है.व्यक्ति के पारिवारिक जीवन में भी परेशानी आती रहती है.ये शंकालु और वहमी प्रकृति के होते हैं.जिस व्यक्ति की कुण्डली में द्वितीय भाव में यह योग बनता है पैतृक सम्पत्ति से सुख नहीं मिलता है.कुटुम्बजनों के साथ इनके बहुत अच्छे सम्बन्ध नहीं रहते.गले के ऊपरी भागों में इन्हें परेशानी होती है.नौकरी एवं कारोबार में रूकावट और बाधाओं का सामना करना होता है.
तृतीय स्थान—में विषयोग सहोदरो के लिए अशुभ होता है.इन्हें श्वास सम्बन्धी तकलीफ का सामना करना होता है.चतुर्थ भाव का विषयोग माता के लिए कष्टकारी होता है.अगर यह योग किसी स्त्री की कुण्डली में हो तो स्तन सम्बन्धी रोग होने की संभावना रहती है.जहरीले कीड़े मकोड़ों का भय रहता है एवं गृह सुख में कमी आती है.पंचम भाव में यह संतान के लिए पीड़ादायक होता है.शिक्षा पर भी इस योग का विपरीत असर होता है.षष्टम भाव में यह योग मातृ पक्ष से असहयोग का संकेत होता है.चोरी एवं गुप्त शत्रुओं का भय भी इस भाव में रहता है.
सप्तम स्थान —कुण्डली में विवाह एवं दाम्पत्य जीवन का घर होता है इस भाव मे विषयोग दाम्पत्य जीवन में उलझन और परेशानी खड़ा कर देता है.पति पत्नी में से कोई एक अधिकांशत: बीमार रहता है.ससुराल पक्ष से अच्छे सम्बन्ध नहीं रहते.साझेदारी में व्यवसाय एवं कारोबार नुकसान देता है.अष्टम भाव में चन्द्र और शनि की युति मृत्यु के समय कष्ट का सकेत माना जाता है.इस भाव में विषयोग होने पर दुर्घटना की संभावना बनी रहती है.नवम भाव का विषयोग त्वचा सम्बन्धी रोग देता है.यह भाग्य में अवरोधक और कार्यों में असफलता दिलाता है.दशम भाव में यह पिता के पक्ष से अनुकूल नहीं होता.सम्पत्ति सम्बन्धी विवाद करवाता है.नौकरी में परेशानी और अधिकारियों का भय रहता है.एकादश भाव में अंतिम समय कष्टमय रहता है और संतान से सुख नहीं मिलता है.कामयाबी और सच्चे दोस्त से व्यक्ति वंचित रहता है.द्वादश भाव में यह निराशा, बुरी आदतों का शिकार और विलासी एवं कामी बनाता है.
प्रसिद्द फिल्म अदाकारा “”ऐश्वर्या राय बच्चन की जन्म कुंडली में भी यह “विष योग” मोजूद हें..

विषयोग के उपाय: —-
–भगवान नीलकंठ महादेव की पूजा एवं महामृत्युजय मंत्र जप से विष योग में लाभ मिलता है. शनि देव एवं चन्द्रमा की पूजा भी कल्यणकारी होती है.
—आप अगर किसी नई परियोजना पर कार्य करने की सोच रहे हैं तो विषयोग और हुताशन योग से परहेज रखें। इस योग में अपनी योजना की शुरूआत नहीं करें। इस योग में घर की नींव न डालें, मकान या दुकान न खरीदें। अगर आप किसी शुभ कार्य के सम्बन्ध में यात्रा पर निकलने की तैयारी कर रहे हैं तो इस योग के गुजर जाने के बाद ही यात्रा पर जाएं तो अच्छा रहेगा क्योंकि यह योग यात्रा के संदभ शुभ फलदायी नहीं कहा गया है।

बुधवार, 30 जुलाई 2014

गणपती आरती


सुख करता दु:ख हरता वार्ता विघ्नाची, नूर्वी पूर्वी प्रेम कृपा जयाची।
सर्वांगी सुन्दर उतीशेंदु राची, कंठी झलके माल मुखता पधांची॥१
जय देव जय देव जय मंगल मूर्ति, दर्शन मारते मन कामना पूर्ति
जय देव जय देव ॥
रत्नखचित फरा तुझ गौरीकुमरा, चंदनाची उती कुमकुम के सहारा।
हीरे जडित मुकुट शोभतो बरा, रुण्झुनती नूपुरे चरनी घागरिया॥२
जय देव जय देव जय मंगल मूर्ति, दर्शन मारते मन कामना पूर्ति
जय देव जय देव ॥
लम्बोदर पीताम्बर फनिवर वंदना, सरल सोंड वक्रतुंडा त्रिनयना।
दास रामाचा वाट पाहे सदना, संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवर वंदना॥३
जय देव जय देव जय मंगल मूर्ति, दर्शन मारते मन कामना पूर्ति
जय देव जय देव ॥
शेंदुर लाल चढायो अच्छा गजमुख को, दोन्दिल लाल विराजे सुत गौरीहर को।
हाथ लिए गुड़ लड्डू साई सुरवर को, महिमा कहे न जाय लागत हुँ पद को॥४
जय जय जय जय जय
जय जय जी गणराज विद्यासुखदाता, धन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मत रमता
जय देव जय देव ॥
अष्ट सिधि दासी संकट को बैरी, विघन विनाशन मंगल मूरत अधिकारी।
कोटि सूरज प्रकाश ऐसे छबी तेरी, गंडस्थल मद्मस्तक झूल शशि बहरी॥५
जय जय जय जय जय
जय जय जी गणराज विद्यासुखदाता, धन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मत रमता
जय देव जय देव ॥
भावभगत से कोई शरणागत आवे, संतति संपत्ति सबही भरपूर पावे।
ऐसे तुम महराज मोको अति भावे, गोसावी नंदन निशिदिन गुण गावे॥६
जय जय जय जय जय
जय जय जी गणराज विद्यासुखदाता, धन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मत रमता
जय देव जय देव ॥
______________________________________
 वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ​।

निर्विघ्नम् कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

सोमवार, 21 जुलाई 2014

किचन में पूजा स्थल शुभ नहीं

जब कोई व्यक्ति घर बनाता है या घर का नवीनीकरण करता है तो चाहता है कि उसका घर वास्तु के अनुसार बने। इसलिए, चार बातों का ध्यान विशेष रूप से रखा जाता है कि घर में पूजा का स्थान ईशान कोण में, रसोई घर आग्नेय कोण में, मास्टर बेडरूम नैर्ऋत्य कोण में और लड़कियों व मेहमानों का कमरा वाचव्य कोण में होना चाहिए। यदि ये चारों सही जगह बन जाए तो यह समझा जाता है कि मकान वास्तु सिद्धान्तों के अनुरूप बना है। किसी घर में यदि इनमें से कोई एक भी सही जगह पर न बना हो तो वास्तु के अनुसार घर को दोषपूर्ण मान लिया जाता है।

इनमें किचन अत्यन्त महत्वपूर्ण है। घर की गृहिणी का किचन से विशेष नाता रहता है। गृहणियां हमेशा इस बात का खयाल रखती हैं कि उनका किचन आग्नेय कोण में हो और यदि ऐसा नहीं हो तो किसी भी परेशानी का कारण किचन के वास्तुदोष पूर्ण होने को ही मान लिया जाता है, जो उचित नहीं है।

यह सही है कि घर के आग्नेय कोण में किचन का स्थान सर्वोत्तम है, पर यदि संभव हो तो उसे किसी अन्य स्थान पर बनाया जा सकता है।

* आग्नेय कोण: किचन की यह स्थिति बहुत शुभ होती है । आग्नेय कोण में किचन होने पर घर की स्त्रियां खुश रहती हैं। घर में समस्त प्रकार के सुख रहते हैं।

* दक्षिण दिशा: इस दिशा में किचन होने से परिवार में मानसिक अशांति बनी रहती है। घर के मालिक को क्रोध अधिक आता है और उसका स्वास्थ्य साधारण रहता है।

* नैर्ऋत्य कोण: जिस घर में किचन दक्षिण या नैर्ऋत्य कोण में होता है उस घर की मालकिन ऊर्जा से भरपूर उत्साहित एवं रोमांटिक मिजाज की होती है।

* पश्चिम दिशा: जिस घर में किचन पश्चिम दिशा में होता है, उस घर का सारा कार्य घर की मालकिन देखती है। उसे अपनी बहू-बेटियों से काफी खुशियां प्राप्त होती हैं। घर की सभी महिला सदस्यों में आपसी तालमेल अच्छा बना रहते हैं, परंतु खाद्यान्न की बर्बादी जरूर ज्यादा होती है।

* वायत्य कोण: जिस घर का किचन वायव्य कोण में होता है, उसका मुखिया रोमांटिक होता है। उसकी कई महिला मित्र होती हैं, किन्तु बेटी को गर्भाशय की समस्या और कभी कभी उसकी बदनामी भी होती है।

* उत्तर दिशा: जिस घर में किचन उत्तर दिशा में होता है, उसकी स्त्रियां बुद्धिमान तथा स्नेहशील होती हैं। उस परिवार के पुरूष सरलता से अपना कारोबार करते हैं और उन्हें धनार्जन में सफलता मिलती है।

* ईशान कोण: ईशान कोण में किचन होने पर परिवार के सदस्यों को सामान्य सफलता मिलती है। परिवार की बुजुर्ग महिला पत्नी, बड़ी बेटी या बड़ी बहु धार्मिक प्रवृति की होती है, परंतु घर में कलह भी होती है।

* पूर्व दिशा: जिस घर में पूर्व दिशा में किचन होता है, उसकी आय अच्छी होती है। घर की पूरी कमान पत्नी के पास होती है। पत्नी की खुशियों में कमी रहती है। साथ ही उसे पित्त गर्भाशय स्नायु तंत्र आदि से संबंधित रोग होने की संभावना रहती है।

किचन से जुड़ी कुछ अन्य जानकारियां निम्नलिखित हैं, जिनका किचन बनाते समय ध्यान रखना चाहिए-

* जिस घर में किचन के अंदर ही स्टोर हो तो गृहस्वामी को अपनी नौकरी या व्यापार में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इन कठिनाइयों से बचाव के लिए किचन व स्टोर रूम अलग-अलग बनाने चाहिए।

* किचन व बाथरूम का एक सीध में साथ-साथ होना शुभ नहीं होता है। ऐसे घर में रहने वालों को जीवन यापन करने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता। ऐसे घर की कन्याओं के जीवन में अशांति रहती है।

* किचन में पूजा स्थान बनाना भी शुभ नहीं होता है। जिस घर में किचन के अंदर ही पूजा का स्थान होता है, उसमें रहने वाले गरम दिमाग के होते हैं। परिवार के किसी सदस्य को रक्त संबंधी शिकायत भी हो सकती है।

* घर के मुख्य द्वार के ठीक सामने किचन नहीं बनाना चाहिए। मुख्य द्वार के एकदम सामने का किचन गृहस्वामी के भाई के लिए अशुभ होता है।

* यदि किचन भूमिगत पानी की टंकी या कुएं के साथ लगा हो तो भाइयों में मतभेद रहते हैं। घर के स्वामी को धन कमाने के लिए बहुत यात्राएं करनी पड़ती हैं।

* घर की बैठक में भोजन बनाना या बैठक खाने के ठीक सामने किचन का होना अशुभ होता है। ऐसे में रिश्तेदारों के मध्य शत्रुता रहती है एवं बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाइयां आती हैं।

* जिस घर में किचन मुख्य द्वार से जुड़ा हो, वहां प्रारंभ में पति-पत्नी के मध्य बहुत प्रेम रहता है घर का वातावरण भी सौहार्दपूर्ण रहता है, किन्तु कुछ समय बाद बिना कारण आपस में मतभेद पैदा होने लगते हैं।

अनुभव में पाया गया है कि जिनके घरों में किचन में भोजन बनाने के साधन जैसे गैस, स्टोव, माइक्रोवेव, अवन इत्यादि एक से अधिक होते हैं, उनमें आय के साधन भी एक से अधिक होते हैं। ऐसे परिवार के सभी सदस्यों को कम से कम एक समय भोजन साथ मिलकर करना चाहिए। ऐसा करने से आपसी संबंध मजबूत होते हैं तथा साथ मिलकर रहने की भावना भी बलवती होती है ।

मुहूर्त : सुख-समृद्धि का शुभ समय


कहते हैं किसी भी वस्तु या कार्य को प्रारंभ करने में मुहूर्त देखा जाता है, जिससे मन को बड़ा सुकून मिलता है। यहाँ हम कोई भी बंगला या भवन निर्मित करें या कोई व्यवसाय करने हेतु कोई सुंदर और भव्य इमारत बनाएँ तो सर्वप्रथम हमें मुहूर्त को प्राथमिकता देनी होगी। 

शुभ तिथि, वार, माह व नक्षत्रों में कोई इमारत बनाना प्रारंभ करने से न केवल किसी भी परिवार को आर्थिक, सामाजिक, मानसिक व शारीरिक फायदे मिलते हैं वरन उस परिवार के सदस्यों में सुख-शांति व स्वस्थता की प्राप्ति भी होती है।


यहाँ शुभ वार, शुभ महीना, शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र भवन निर्मित करते समय इस प्रकार से देखे जाने चाहिए ताकि निर्विघ्न, कोई भी कार्य संपादित हो सके। 

  1. शुभ वार : सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार (गुरुवार), शुक्रवार तथा शनिचर (शनिवार) सर्वाधिक शुभ दिन माने गए हैं। मंगलवार एवं रविवार को कभी भी भूमि पूजन, गृह निर्माण की शुरुआत, शिलान्यास या गृह प्रवेश नहीं करना चाहिए। 
  2. शुभ माह : देशी या भारतीय पद्धति के अनुसार फाल्गुन, वैशाख एवं श्रावण महीना गृह निर्माण हेतु भूमि पूजन तथा शिलान्यास के लिए सर्वश्रेष्ठ महीने हैं, जबकि माघ, ज्येष्ठ, भाद्रपद एवं मार्गशीर्ष महीने मध्यम श्रेणी के हैं। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि चैत्र, आषाढ़, आश्विन तथा कार्तिक मास में उपरोक्त शुभ कार्य की शुरुआत कदापि न करें। इन महीनों में गृह निर्माण प्रारंभ करने से धन, पशु एवं परिवार के सदस्यों की आयु पर असर गिरता है। 
  3. शुभ तिथि : गृह निर्माण हेतु सर्वाधिक शुभ तिथियाँ ये हैं : द्वितीया, तृतीया, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी एवं त्रयोदशी तिथियाँ, ये तिथियाँ सबसे ज्यादा प्रशस्त तथा प्रचलित बताई गई हैं, जबकि अष्टमी तिथि मध्यम मानी गई है।  प्रत्येक महीने में तीनों रिक्ता अशुभ होती हैं। ये रिक्ता तिथियाँ निम्न हैं- चतुर्थी, नवमी एवं चौदस या चतुर्दशी। यहाँ रिक्ता से आशय रिक्त से है, जिसे बोलचाल की भाषा में खालीपन या सूनापन लिए हुए रिक्त (खाली) तिथियाँ कहते हैं। अतः इन उक्त तीनों तिथियों में गृह निर्माण निषेध है। 
  4. शुभ नक्षत्र : किसी भी शुभ महीने के रोहिणी, पुष्य, अश्लेषा, मघा, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपदा, स्वाति, हस्त, चित्रा, रेवती, शतभिषा, धनिष्ठा सर्वाधिक उत्तम एवं पवित्र नक्षत्र हैं। गृह निर्माण या कोई भी शुभ कार्य इन नक्षत्रों में करना हितकर है। बाकी सभी नक्षत्र सामान्य नक्षत्रों की श्रेणी में आ जाते हैं। 

सात "स" से शुभारंभ 
शास्त्रानुसार (स) अथवा (श) वर्ण से शुरू होने वाले सात शुभ लक्षणों में गृहारंभ निर्मित करने से धन-धान्य व अपूर्व सुख-वैभव की निरंतर वृद्धि होती है व पारिवारिक सदस्यों का बौद्धिक, मानसिक व सामाजिक विकास होता है। सप्त साकार का यह योग है, स्वाति नक्षत्र, शनिवार का दिन, शुक्ल पक्ष, सप्तमी तिथि, शुभ योग, सिंह लग्न एवं श्रावण माह। अतः गृह निर्माण या कोई भी कार्य के शुभारंभ में मुहूर्त पर विचार कर उसे क्रियान्वित करना अत्यावश्यक है।