सोमवार, 30 मार्च 2015

33 कोटि देवताओं का रहस्य

हिन्दू धर्म में ३३ कोटि देवी-देवता हैं । ऐसे में किस देवता के जप से शीघ्र आध्यात्मिक प्रगति संभव है, आज इस बिन्दु पर हम विचार करेंगे । यदि हमने किसी संत या गुरु से गुरु मंत्र लिया है तो उसका जप करना चाहिए और यदि नहीं लिया है तो गुरु ढूँढने का प्रयत्न नहीं चाहिए, क्योंकि कलियुग में ९८ प्रतिशत गुरु ढोंगी होते हैं और कोई अध्यात्मविद संत हैं या नहीं, यह हमें ज्ञात हो जाय, इसके लिए या तो हमारे पास सूक्ष्मका ज्ञान हो या साधनाका ठोस आधार हो, जो साधना की आरंभिक अवस्था में हमें नहीं होता है।
  • कुल देवता

अतः गुरु बनाने के फेर में पड़ने के स्थान पर, अध्यात्म शास्त्र अनुसार साधना करने का प्रयास करना चाहिए, और सनातन धर्म में इसका अत्यंत सुन्दर विधान है। सभी को अपने कुलदेवता का जप करना चाहिए । कुल देवता की व्युत्पत्ति और अर्थ देख लेते हैं । कुल, अर्थात मूल और मूलका संबंध मूलाधार चक्र, या कुण्डलिनी शक्ति से होता है । कुल + देवता, अर्थात जिस देवता की उपासना से मूलाधार चक्र जागृत होता है, अर्थात कुंडलिनी शक्ति जागृत हो जाती है, अर्थात आध्यात्मिक उन्नति आरम्भ होती है, उन्हें कुलदेवता कहते हैं। कुलदेवताके तत्त्व में सभी 33 कोटि देवता के तत्त्व समाहित होते हैं । अतः कुलदेवता के जप से उन तत्त्व की 30% तक वृद्धि हो जाती है और यह जप पूर्ण होने पर, गुरु का हमारे जीवन में स्वतः ही प्रवेश हो जाता है । यदि कुलदेवता का नाम पता हो, तो कुलदेवता के नाम के आगे ‘श्रीऽ लगाएँ और तत्पश्चात देवता के नाम के साथ चतुर्थी का प्रत्यय लगाएँ और अंत में “नमः” लगाएँ । इस प्रकार कुलदेवता का जप करें, जैसे यदि कुलदेवता ‘गणेशऽ हों, तो ‘श्री गणेशाय नमःऽ और यदि कुलदेवी ‘भवानीऽ हों, तो ‘श्री भवानी देव्यै नमःऽ, इस प्रकार जप करें । यदि कुलदेवता का नाम नहीं पता हो, तो ‘श्री कुलदेवतायै नमःऽ जपें और अपने इष्ट का स्वरूप अपने मन में रखें ।

जिनके लिए जीवन में साधना प्रधान हो और सांसारिक जीवन गौण हो, अर्थात जिनका आध्यात्मिक स्तर 50% से अधिक हो, ऐसे साधक को उच्च कोटि के देवता जैसे राम, कृष्ण, दुर्गा, शिव, हनुमान, दत्त, गणपति में से जो उनके आराध्य हों, उनका जप करना चाहिए ।

वर्तमान काल में 50% साधारण व्यक्तियों को और 70% अच्छे साधकों को अनिष्ट शक्ति का तीव्र कष्ट है । ऐसे में सर्वप्रथम अनिष्ट शक्ति के कष्ट के निवारणार्थ जप करें ।

  • अनिष्ट शक्ति क्या होती है ?

ईश्वर ने सृष्टि की रचना के साथ ही दो शक्तियों देव और असुर का निर्माण किया जिसमें एक है इष्टकारी शक्ति, कल्याणकारी शक्ति और दूसरा अनिष्ट शक्ति अर्थात विनाशकारी शक्ति । जब किसी दुर्जन की मृत्यु हो जाए और उसका क्रिया-कर्म वैदिक रीतिसे न हुआ हो, या उसके कर्मानुसार उसे गति न मिले, तो वे भी अनिष्ट शक्ति के गुट में चले जाते हैं । उसी प्रकार हमारे पूर्वजों ने पाप कर्म किए हों, या उनकी कोई इच्छा अतृप्त रह गई हो और हम अतृप्त पितरों की सद्गति के लिए योग्य साधना नहीं करते हों, तो वे भी अनिष्ट शक्ति के गुट में चले जाते हैं और साधनाके अभावमें बलाढ्य आनिष्ट शक्तियां उन्हें सूक्ष्म जगतमें बंधक बना, उनसे बुरे कर्म करवाती हैं अतः उनसे भी कष्ट होता है ।

वर्तमान समय में धर्माचरण के अभाव में व्यष्टि (वैयक्तिक) एवं समष्टि (सामाजिक) जीवनमें अनिष्ट शक्ति का कष्ट बढ़ गया है और चारों ओर ‘त्राहिमांऽ की स्थिति बन गयी है । अनिष्ट शक्तिके कारण किस प्रकारके कष्ट हो सकते हैं? अवसाद (डिप्रेशन), आत्म-हत्याके विचार आना, अत्यधिक क्रोध आना और उस आवेशमें अपना आपा पूर्ण रूप से खो देना, मनमें सदैव वासना के विचार आना, नींद न आना, अत्यधिक नींद आना, शरीरके किसी भागमें वेदना होना और औषधि द्वारा उस वेदना का ठीक न हो पाना, मनका अत्यधिक अशांत रहना, व्यवसाय में सदैव हानि होना, परीक्षा के समय सदैव कुछ न कुछ अड़चन आना, घरमें सदैव कलह-क्लेश रहना, लगातार गर्भपात होना, बिना कारण आर्थिक हानि होना, रोग का वंशानुगत होना, व्यसनी होना, लगातार अपघात या दुर्घटना होते रहना, नौकरी या जीविकोपार्जन में सदैव अड़चन आना, सामूहिक बलात्कार, समलैंगिकता, भयावह यौन रोग, यह सब अनिष्ट शक्तियों के कारण होते हैं।

यदि किसीको अनिष्ट शक्तिका कष्ट हो तो आरम्भमें एक वर्षके लिए ‘श्रीगुरुदेव दत्तऽ का जप अधिकसे अधिक करना चाहिए और उसके पश्चात ‘सात नामजपका प्रयोगऽ कर, जिस नामजपसे कष्ट हो, उनका अखंड जप करना चाहिए। एक महीनेके पश्चात पुनः प्रयोग कर नए नामजपको ढूंढ कर निकालना चाहिए। ऐसे करनेसे उनके जीवनमें सूक्ष्म अनिष्ट शक्तियोंद्वारा दिये जानेवाले कष्ट अति शीघ्र कम हो जाते हैं अन्यथा साधनाका व्यय, अनिष्ट शक्तिद्वारा दिए जा रहे कष्टपर मात करने हेतु हो जाता है और आध्यात्मिक प्रगति नहीं होती ।

‘सप्त देवताका नामजप प्रयोगऽ कैसे कर सकते हैं, यह संक्षेपमें देख लेते हैं । स्नानकर या हाथ मुंह धोकर, स्वच्छ और पवित्र स्थानपर बैठ जाएँ और राम, कृष्ण, दुर्गा, शिव, हनुमान, दत्त, गणपति, इनके क्रमशः ‘श्री राम जय राम जय जय रामऽ, ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवायऽ, ‘ ॐ श्री दुर्गा देव्यै नमःऽ , ‘ॐ नमः शिवायऽ, ‘ॐ हं हनुमते नमःऽ, ‘ॐ श्री गुरुदेव दत्तऽ, ‘ॐ गं गणपतये नमःऽ जपके समय किस जपसे सर्वाधिक कष्ट हो रहा है यह देखें । जिस जपसे सबसे अधिक कष्ट हो रहा हो, वह जप अगले एक महीनेके लिए करना चाहिए ।

यदि जप करते समय तनिक भी कष्ट न हो तो जिस जपमें सबसे कम विचार आयें, वह जप करें । जप करते समय नींद आना, बुरे विचार आना, जप करनेका मन न करना, जी मितलाना, उबासियाँ आना, शरीर में वेदना होना जैसे कष्ट हों तो समझें कि अनिष्ट शक्ति का कष्ट है । इन्हीं सभी सात जप को पांच-पांच मिनट करें और एक जप पांच मिनट करने के पश्चात उस दौरान क्या हुआ, यह एक कॉपी में लिख कर पुनः जप आरम्भ करने से पहले अगले उपास्य देवता को प्रार्थना करें । “हे भगवन, मेरे जीवन में जो भी अनिष्ट शक्ति मेरे व्यावहारिक एवं आध्यात्मिक जीवन में अड़चनें निर्माण कर रही हैं, उनपर मात पाने हेतु नाम जप का प्रयोग कर रही/रहा हूँ । नामजप के प्रयोग में सहायता करें और इससे पहले जो हमने जप किया, उसका प्रभाव इस जपके समय न हो ऐसी आप कृपा करेंऽऽ। प्रत्येक महीने जप का प्रयोग क्यों करना चाहिए ? एक महीने में या तो वह अनिष्ट शक्ति उस जपका कोई तोड़ ढूंढ लेती है, या उसे मुक्ति मिलने पर, कोई दूसरी अनिष्ट शक्ति हमें कष्ट देने लगती है । अतः जब तक अनिष्ट शक्ति के कष्ट कम न हो जाएँ, तब तक यह सात नाम जप का प्रयोग करते रहना चाहिए ।

इस ब्रह्माण्ड में 33 कोटी देव है नही सिर्फ एक ही देव हैं जो निरंजन निराकार हैं। लोगों को इस बात की बहुत बड़ी गलतफहमी है कि हिन्दू सनातन धर्म में 33 करोड़ देवी-देवता हैं । लेकिन ऐसा है नहीं और, सच्चाई इसके बिलकुल ही विपरीत है । दरअसल हमारे वेदों में उल्लेख है 33 “कोटि” देवी-देवता। अब “कोटि” का अर्थ “प्रकार” भी होता है और “करोड़” भी । तो लोगोँ ने उसे हिंदी में करोड़ पढना शुरू कर दिया जबकि वेदों का तात्पर्य 33 कोटि अर्थात 33 प्रकार के देवी-देवताओं से है (उच्च कोटि.. निम्न कोटि इत्यादि शब्द तो आपने सुना ही होगा जिसका अर्थ भी करोड़ ना होकर प्रकार होता है) ये एक ऐसी भूल है जिसने वेदों में लिखे पूरे अर्थ को ही परिवर्तित कर दिया। इसे आप इस निम्नलिखित उदाहरण से और अच्छी तरह समझ सकते हैं । अगर कोई कहता है कि बच्चों को “कमरे में बंद रखा” गया है । और दूसरा इसी वाक्य की मात्रा को बदल कर बोले कि बच्चों को कमरे में ” बंदर खा गया ” है। (बंद रखा़ बंदर खा) सिर्फ इतना ही नहीं हमारे धार्मिक ग्रंथों में साफ-साफ उल्लेख है कि “निरंजनो निराकारो एको देवो महेश्वरः” अर्थात इस ब्रह्माण्ड में सिर्फ एक ही देव हैं जो निरंजन निराकार महादेव हैं । साथ ही यहाँ एक बात ध्यान में रखने योग्य बात है कि हिन्दू सनातन धर्म मानव की उत्पत्ति के साथ ही बना है और प्राकृतिक है इसीलिए हमारे धर्म में प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर जीना बताया गया है और प्रकृति को भी भगवान की उपाधि दी गयी है ताकि लोगप्रकृति के साथ खिलवाड़ ना करें।

जैसे कि :
1 गंगा को देवी माना जाता है क्योंकि गंगाजल में सैकड़ों प्रकार की हिमालय की औषधियां घुली होती हैं । 
2 गाय को माता कहा जाता है क्योंकि गाय का दूध अमृत तुल्य और, उनका गोबर एवं गौ मूत्र में विभिन्न प्रकार की औषधीय गुण पाए जाते हैं । 
3 तुलसी के पौधे को भगवान इसीलिए माना जाता है कि तुलसी के पौधे के हर भाग में विभिन्न औषधीय गुण हैं । 
4 इसी तरह वट और बरगद के वृक्ष घने होने के कारण ज्यादा ऑक्सीजन देते हैं और, थके हुए राहगीर को छाया भी प्रदान करते हैं। 

यही कारण है कि हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथों में प्रकृति पूजा को प्राथमिकता दी गयी है क्योंकि, प्रकृति से ही मनुष्य जाति है ना कि मनुष्य जाति से प्रकृति है । अतः प्रकृति को धर्म से जोड़ा जाना और उनकी पूजा करना सर्वथा उपर्युक्त है । यही कारण है कि हमारे धर्म ग्रंथों में सूर्य, चन्द्र, वरुण, वायु, अग्नि को भी देवता माना गया है और इसी प्रकार कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैं । इसीलिए, आप लोग बिलकुल भी भ्रम में ना रहें क्योंकि ब्रह्माण्ड में सिर्फ एक ही देव हैं जो निरंजन निराकार महादेव हैं।
  • अतः कुल 33 प्रकार के देवता हैं : 

12 आदित्य है : धाता, मित्, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान, पूषा, सविता, त्वष्टा, एवं विष्णु। 8 वसु हैं : धर, ध्रुव,सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष एवं प्रभाष 11 रूद्र हैं : हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजिता, वृषाकपि, शम्भू, कपर्दी, रेवत, म्रग्व्यध, शर्व तथा कपाली। 2 अश्विनी कुमार हैं। कुल : 12 +8 +11 +2=33

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

पश्चिम की कुरीतियाँ अब भारत में

मैने बचपन से ही अपने माता-पिता और दादा-दादी से सदाचार संस्कार की शिक्षा पाई जो मुझे अब तक उसी राह पर चलने को प्रेरित कर रहा है। बचपन में ही यदि संस्कार के वीज बच्चे के मन में डाल दिये जाएँ तो बड़े होने पर बच्चे को उसका लाभ अवश्य मिलता है । 

मैं एक छोटे गांव से हूँ पर इस समय मुम्ब​ई में हूँ और मुम्ब​ई पश्चिम सभ्यता के करीब माना जाता है । इसके दो कारण हैं, 1. फ़िल्म सिटी, 2. पश्चिम का तट । यहाँ की फ़िल्मी दुनियाँ वैसी नहीं है जो हमें परदे पर परोसती है मुम्ब​ई में न तो अच्छे लोगों की कमी है न ही बुरे लोगों की यहाँ बुरे वे हैं जो अपने घर से माता-पिता के बन्धनों से आज़ाद हैं, ज़िन्हें न कोई डाटने वाला है और न कोई समझाने वाला । दूर गांव से पड़ने, कमाने और हीरो बनने के लिए आने बाले बच्चे सबसे पहले ख़ुदको बम्बैया कल्चर में ढालना पसंद करते हैं । 

मैंने यहाँ वह भी देखा जो शायद पर्दों में भी नहीं दिखाया जाता और यदि दिखाया भी गया हो तो मैं पर्दे पर कभी नहीं देखा । यहाँ लड़के लड़कियों में कोई अन्तर नहीं है। मेरे गांव में एक बूढी दादी बिड़ी पिया करती थी यह उसकी लत ही थी । पर वह पूरे गांव में चर्चित थी पर यहाँ क​ई बूढी तो नहीं पर 17 से 35 वर्ष तक महिलाएँ खुले में सिगरेट शराब पीती नजर आ ही जाती हैं। गलबहियाँ डाले न तो शर्म न हया अपनी मस्ती में मस्त हर गली चौक में नज़र आते हैं ।

आये दिन अख्बार में यही देखने को मिलता है उस लड़की को एक लड़के ने धोका दिया, उसका मर्डर किया, यहाँ के लिए यह सब आम बात है। पर क्या यही हमारा भारत है, क्या यही हमारी संस्कृती है। सनातन धर्म का संस्कार सकल विश्व में चर्चित है जिसे देखने लोग आते हैं और वे यहाँ उस संस्कार उस सभ्यता को देखना तो दूर उसे लोगों के अन्दर शूँघने में भी नहीं पाते यह कैसी विडम्बना है, कुछ कह नहीं सकते ।

कर्म का फल प्रत्यक्ष​

बचपन में मैने सुना था तब से जब कभी भी कहीं चींटियों को रात- दिन काम करते देखा करता हूँ, अफसोश की चींटि नहीं मैं ही उन्हें देख थक जाता हूँ । सचमुच अपने भार से भी कहीं गुना बोझ लिए चींटियाँ पर्वतों से भी विकट चढाई को चढ जातीं हैं । इसमें तनिक भी संदेह नहीं की वो दीवार की चढाईयों चढते वक्त कितनी बार गिर जाया करती हैं पर उनका विश्वास और उनकी ज़िद चीटियों तक ही नहीं हम मनाव समाज तक चर्चित  है। अथक परिश्रम का प्रतीक बन चुकी चींटियाँ मानव समाज को एक शिक्षा ही दे रहीं हैं, परन्तु आज भी लोग मुफ़्त का खाना ज्यादा पसंद करते हैं । 

समाज में दो वर्ग के लोग हैं, एक जो आपको अच्छा मानते हैं और दूसरे वो जो आपको अच्छा बनने नहीं देना चाहते, जिस तरह वे गिरे हुए हैं उसी जगह पर आपको भी देखना चाहते हैं । परन्तु हम किसके पक्ष में हैं यह तो स्वयं हम ही जानते हैं । फिर हम जानते हुए भी अच्छा नहीं बन पाते और न ही प्रयास कर पाते हैं, इसका मात्र एक ही कारण है और वह आत्मविश्वास की कमी, चींटियों का आत्मविश्वास देखो ।  वह जानती है कि वह जो कार्य कर रही है उसमें कठिनाई है पर असम्भव नहीं और वह अपने कर्म से अपने ज़िद को पूरा कर जाती है।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

फिटकरी-आयुर्वेद​

भगवान का दिया हुआ यह शरीर इसी रूप में सुन्दर लगता है। यदि शरीर का कोई भी अंग फूल जाए अथवा कट-फट जाये तो शरीर बेढंगा ही लगेगा और पूरी क्षमता से काम भी नहीं करेगा। इसलिए शरीर को सुन्दर एवं स्वस्थ बनाये रखने के लिए कुछ प्राकृतिक उपायों को अपनाए जाने की जरूरत अक्सर महसूस की जाती है। फिटकरी का प्रयोग करके भी आप अपने शरीर के हर अंग को कुदरती सांचे में ढाल सकते हैं और महिलाओं के लिए तो फिटकरी विशेष रूप से अनुकूल है। यौनांग खुल जाने पर यदि वे फिटकरी से दो-चार बार गुप्तांग को धो लेंगी तो वे कुंवारी कन्या के समान हो जायेंगी। फिटकरी घाव को तुरन्त भरने में भी अत्यन्त लाभकारी है। दाढ़ी बनाने के बाद चेहरे पर फिटकरी मलने से चेहरा मुलायम हो जाता है। फिटकरी कई तरह के रोगों में विशेष रूप से लाभकारी है- 
दांत का दर्द

फिटकरी और काली मिर्च पीसकर दांतों की जड़ों में मलने से दांतों की पीड़ा में लाभ होते है।
दांत हिलना

भुनी हुई फिटकरी एक तोला, भुना हुआ तूतिया छह माशा, कत्छा एक तोला, इन सबको कूट पीसकर मंजन बनाकर लगाने से दांतों की पीड़ा दूर होती है और दांत मजबूत तथा सुदृढ़ होते हैं।
दमा

फुलाई हुई फिटकरी एक तोला और मिश्री दो तोला दोनों को महीन पीसकर रख लें। एक-एक माशा नित्य सवेरे खाने से दमा के रोग में लाभ होता है। दमे के रोगियों के लिए शहद, प्याज, लहसुन व तुलसी की चाय तथा गुड़ अमृत के समान हैं। दालचीनी के टुकड़े मुंह में डालकर चूसते रहें।
कान का बहना

कान में फुंसी हो अथवा मवाद आता हो तो एक प्याले में थोड़ी-सी फिटकरी पीसकर पानी डालकर घोलें और पिचकारी द्वारा कान धोएं।
आंखों में जाला

आधा चम्मच शहद और दो ग्राम फिटकरी पिसी हुई किसी छोटी-सी डिबिया में डालकर ढक्कन बन्द करके रख दें। शहद और फिटकरी के इस मिश्रण की सलाई सुबह और शाम दोनों समय आंखों में लेते रहें। अवश्य लाभ होगा।
आंखों में लाली

शहद में फिटकरी मिलाकर आंखों में डालने से आंखों की लाली समाप्त हो जाती है।
आंखों में जलन

फिटकरी की बिल्कुल थोड़ा-सा साफ चूर्ण दूध की मलाई में मिलाकर पलकों पर लेप करें और सो जाएं। कुछ दिनों के प्रयोग से काफी लाभ होगा।
खाज खुजली

खुजली वाली जगह को फिटकरी वाले पानी से धोएं और बाद में उस जगह पर थोड़ा-सा कड़वा तेल लगा लें। उस पर थोड़ा-सा कपूर भी डाल लें। अवश्य लाभ होगा।
प्रदर

फिटकरी के पानी से योनि को सुबह-शाम नियमित धोएं। पंसारी से संगे जराहत और फिटकरी लेकर दोनों पीस लें और इस आधा ग्राम चूर्ण की फंकी ताजे पानी के साथ या गाय के दूध के साथ सुबह, दोपहर और शाम दिन में तीन बार लें। कुछ ही दिनों के प्रयोग से अवश्य लाभ होगा।

आयुर्वेद​


  1. कौंच के बीज, सफेद मूसली और अश्वगंधा के बीजों को बराबर मात्रा में मिश्री के साथ मिलाकर बारीक चूर्ण तैयार कर लें। इस चूर्ण में से एक चम्मच चूर्ण सुबह और शाम दूध के साथ लेने से लिंग का ढीलापन, शीघ्रपतन और वीर्य की कमी होना जैसे रोग जल्दी दूर हो जाते हैं।
  2. मूसली के लगभग 10 ग्राम चूर्ण को 250 ग्राम गाय के दूध में मिलाकर अच्छी तरह से उबालकर किसी मिट्टी के बर्तन में रख दें। इस दूध में रोजाना सुबह और शाम पिसी हुई मिश्री मिलाकर सेवन करने से लिंग का ढीलापन, शीघ्रपतन और संभोग क्रिया की इच्छा करना, वीर्य की कमी होना आदि रोगों में बहुत लाभ मिलता है।
  3. कौंच को कपिकच्छू और कैवांच आदि के नामों से भी जाना जाता है। संभोग करने की शक्ति को बढ़ाने के लिए इसके बीज बहुत लाभकारी रहते हैं। इसके बीजों का सेवन करने से वीर्य की बढ़ोत्तरी होती है, संभोग करने की इच्छा तेज होती है और शीघ्रपतन रोग में लाभ होता है। इसके बीजों का उपयोग करने के लिए बीजों को दूध या पानी में उबालकर उनके ऊपर का छिलका हटा देना चाहिए। इसके बाद बीजों को सुखाकर बारीक चूर्ण बना लेना चाहिए। इस चूर्ण को लगभग 5-5 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम मिश्री के साथ दूध में मिलाकर सेवन करने से लिंग का ढीलापन और शीघ्रपतन का रोग दूर होता है।
  4. एक किलो इमली के बीजों को तीन-चार दिनों तक पानी में भीगे पड़े रहने दें। इसके पश्चात उन बीजों को पानी से निकालकर और छिलके उतारकर ठीक तरह से पीस लें। इसमें इससे दो गुना पुराने गुड़ को मिलाकर इसे आटे की तरह गूंथ लें। फिर इसकी बेर के बराबर गोलियां बना लें। सेक्स क्रिया करने के दो घंटे पहले इसे दूध के साथ इस्तेमाल करें। इस तरह का उपाय सेक्स करने की ताकत को और अधिक मजबूत बनाता है।
  5. शतावरी, गोखरू, तालमखाना, कौंच के बीज, अतिबला और नागबला को एकसाथ मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर 2-2 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम दूध के साथ रोजाना सेवन करने से स्तंभन शक्ति तेज होती है और शीघ्रपतन के रोग में लाभ होता है। रात को संभोग क्रिया करने से 1 घंटा पहले इस चूर्ण को गुनगुने दूध के साथ सेवन करने से संभोग क्रिया सफलतापूर्वक संपन्न होती है। वीर्य का पतला होना, यौन-दुर्बलता और विवाह के बाद शीघ्रपतन होना जैसे रोगों में इसका सेवन बहुत लाभकारी रहता है।
  6. मोचरस, कौंच के बीज, शतावरी, तालमखाना को 100-100 ग्राम की मात्रा में लेकर लगभग 400 ग्राम मिश्री के साथ मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 2-2 चम्मच की मात्रा में सुबह और शाम दूध के साथ सेवन करने से बुढ़ापे में भी संभोग क्रिया का पूरा मजा लिया जा सकता है। इस योग को लगभग 2-3 महीने तक सेवन करना लाभकारी रहता है।
  7. लगभग 6 चम्मच अदरक का रस, 8 चम्मच सफेद प्याज का रस, 2 चम्मच देशी घी और 4 चम्मच शहद को एक साथ मिलाकर किसी साफ कांच के बर्तन में रख लें। इस योग को रोजाना 4 चम्मच की मात्रा में सुबह खाली पेट सेवन करना चाहिए। इसको लगातार 2 महीने तक सेवन करने से स्नायविक दुर्बलता, शिथिलता, लिंग का ढीलापन, कमजोरी आदि दूर हो जाते हैं।
  8. बबूल की कच्ची पत्तियां, कच्ची फलियां और गोंद को बराबर मात्रा में मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें और इनमें इतनी ही मात्रा में मिश्री मिलाकर किसी डिब्बे आदि में रख लें। इस चूर्ण को नियमित रूप से 2 महीने तक 2-2 चम्मच की मात्रा में दूध के साथ सेवन करने से वीर्य की वृद्धि होती है और स्तंभन शक्ति बढ़ती है। इसके अलावा यह योग शीघ्रपतन और स्वप्नदोष जैसै रोगों में बहुत लाभकारी रहता है।
  9. सफेद मूसली के चूर्ण और मुलहठी के चूर्ण को बराबर की मात्रा में मिला लें। इस चूर्ण को 1 चम्मच की मात्रा में सुबह और शाम शुद्ध घी के साथ मिलाकर चाट लें और ऊपर से गर्म दूध पी लें। इस योग को नियमित सेवन करने से धातु वृद्धि होती है, नपुंसकता दूर होती है और शरीर पुष्ट और शक्तिशाली बनता है।
  10. 10-10 ग्राम धाय के फूल, नागबला, शतावरी, तुलसी के बीज, आंवला, तालमखाना और बोलबीज, 5-5 ग्राम अश्वगंध, जायफल और रूदन्तीफल, 20-20 ग्राम सफेद मूसली, कौंच के बीज और त्रिफला तथा 15-15 ग्राम त्रिकटु, गोखरू को एक साथ जौकुट करके चूर्ण बना लें। इसके बाद इस मिश्रण के चूर्ण को लगभग 16 गुना पानी में मिलाकर उबालने के लिए रख दें। उबलने पर जब पानी जल जाए तो इसमें 10 ग्राम भांगरे का रस मिलाकर दुबारा से उबाल लें। जब यह पानी गाढ़ा सा हो जाए तो इसे उतारकर ठंडा करके कपड़े से अच्छी तरह मसलकर छान लें और सुखाकर तथा पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में 20 ग्राम शोधी हुई शिलाजीत, 1 ग्राम बसन्तकुसूमाकर रस और 5 ग्राम स्वर्ण बंग को मिला लें। इस औषधि को आधा ग्राम की मात्रा में शहद के साथ मिलाकर सुबह-शाम चाटकर ऊपर से गर्म दूध पी लें। इस औषधि को सेवन करने से पुरुषों के शरीर में बल और वीर्य की बढ़ोत्तरी होती है और वह संभोगक्रिया को लंबे समय तक चला सकता है। इस औषधि के सेवन काल के दौरान खटाई, तेज मिर्च-मसाले वाले और तले हुए भोजन का सेवन करना चाहिए।
  11. मुलहठी के बारीक चूर्ण को 10 ग्राम की मात्रा में घी और शहद से साथ चाटकर ऊपर से दूध पीने से संभोग शक्ति बहुत तेज होती है।
  12. सर्दी के मौसम में उड़द की दाल के लड्ड़ू बनाकर रोजाना सुबह के समय खाकर ऊपर से दूध पीने से शरीर में बल और वीर्य की वृद्धि होती है।
  13. लगभग 20 ग्राम उड़द की दाल के छिलके उतारकर रात के समय पानी में भिगों दें। सुबह इस दाल को बारीक पीसकर पिट्ठी बना लें और कड़ाही में डालकर घी के साथ गुलाबी होने तक सेक लें। इसके बाद एक दूसरे बर्तन में 250 ग्राम दूध डालकर उबाल लें। दूध के उबलने पर इसमें सिंकी हुई उड़द की दाल डालकर पका लें। पकने पर इसमें शक्कर डालकर नीचे उतार लें। इस खीर को ठंडा करके रोजाना सुबह नाश्ते के समय 2 चम्मच शहद के साथ सेवन करने से पुरुष की संभोग शक्ति बहुत ज्यादा तेज हो जाती है।
  14. लगभग 250 ग्राम शतावरी घृत में इतनी ही मात्रा में शक्कर, 5 ग्राम छोटी पीपल और 5 चम्मच शहद मिला लें। इस मिश्रण को 1-1 चम्मच की मात्रा में सुबह और शाम दूध के साथ सेवन करने से संभोग करने की शक्ति तेज हो जाती है।
  15. कौंच के बीज, उड़द, गेंहू, चावल, शक्कर, तालमखाना और विदारीकंद को बराबर मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में दूध मिलाकर आटे की तरह गूंथ लें। इसके बाद इसकी छोटी-छोटी पूड़ियां बनाकर गाय के घी में तल लें। इन पूड़ियों को खाकर ऊपर से दूध पीने से वीर्य की बढ़ोतरी होती है और संभोग करने की शक्ति तेज होती है। दिए गए द्रव्यों के देशी घी में लड़डू बनाकर सेवन करना भी बहुत लाभकारी रहता है।
  16. जानकारी- उड़द की दाल और कौंच के बीजों को प्रयोग में लाने से पहले उन्हें गर्म पानी या दूध में उबालकर उनके छिलके उतार लेने चाहिए।
  17. दही की मलाई में उतनी ही मात्रा में वंशलोचन, कालीमिर्च, शक्कर, शहद और काली मिर्च मिला लें। इसके बाद एक मिट्टी के घड़े के मुंह पर साफ कपड़ा बांध देना चाहिए तथा उस कपड़े से दिए गए मिश्रण को छान लें। इससे मिश्रण छनकर उस घड़े के अंदर जमा हो जाएगा। इस छने हुए मिश्रण को रोजाना 2-2 चम्मच की मात्रा में घी के साथ सेवन करके ऊपर से दूध पीने से पुरुष के शरीर में ताकत आती है और संभोग शक्ति तेज होती है।
  18. 30 पीस छोटी पीपल को लगभग 40 ग्राम तिल के तेल या गाय के घी में भूनकर बिल्कुल पाउडर बना लें। फिर उसमें शहद और शक्कर मिलाकर दूध निकालने के बर्तन में डालकर उसी के अंदर गाय का दूध दूह लें। इस दूध को अपनी रुचि के अनुसार सेवन करें। इसको 1-1 चम्मच की मात्रा में गाय के ताजा निकले हुए दूध के साथ सेवन करने से बल और वीर्य की वृद्धि होती है।
  19. 100-100 ग्राम शतावरी, कौंच के बीज, उड़द, खजूर, मुनक्का दाख और सिंघाड़ा को मोटा-मोटा पीसकर चूर्ण बना लें। इसके बाद 1 लीटर दूध में इतनी ही मात्रा में पानी मिलाकर इसमें चूर्ण को भी मिला लें और हल्की आग पर पकाने के लिए रख दें। पकने पर जब सिर्फ दूध बच जाए तो नीचे उतारकर छान लें। फिर इसमें लगभग 300-300 ग्राम चीनी, वंशलोचन का बारीक चूर्ण और घी मिला लें। इसके बाद इसमें शहद मिलाकर 50 ग्राम की मात्रा में रोजाना सुबह और शाम सेवन करने से बल और वीर्य बढ़ता है।
  20. लगभग 25 ग्राम खस-खस के दाने, 25 ग्राम भुने चने, 25 ग्राम खांड और नारियल की पूरी गिरी को एक साथ कूटकर पीसकर रख लें। इस चूर्ण को रोजाना 70 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से शरीर में वीर्य और ताकत की बढ़ोत्तरी होती है।
  21. लौंग, अकरकरा, कबाबचीनी, ऊदस्वालिस और बीजबंद को बराबर की मात्रा में लेकर कूटकर और पीसकर छान लें। इसके बाद इस चूर्ण के वजन से 2 गुणा पुराना गुड़ लेकर लेकर इसमें मिला लें और छोटी-छोटी गोलियां बना लें। यह 1-1 गोली रोजाना सुबह और शाम दूध के साथ 21 दिनों तक लेने से शरीर में बल और वीर्य की वृद्धि होती है और संभोग करने की शक्ति तेज होती है।
  22. 25 ग्राम पिसी-छनी हुई मुलहठी, 25 ग्राम पिसी और छनी असगंध, और 12 ग्राम पिसा और छना हुआ बिधारा को एकसाथ मिलाकर शीशी में भर लें। सर्दी के मौसम में इसमें से 3 ग्राम चूर्ण को अच्छी तरह से घुटे हुए लगभग 0.12 ग्राम मकरध्वज के साथ मिला लें। इसके बाद इसे मिश्री मिले दूध के साथ रोजाना सुबह और शाम 3-4 महीनों तक सेवन करने से संभोग शक्ति तेज होती है।
  23. लगभग 25-25 ग्राम सफेद बूरा, ढाक की छाल का रस, गेंहू का मैदा और शुद्ध घी को एकसाथ मिलाकर हलवा बना लें। इस हलुए को रोजाना सुबह और शाम सेवन करने से शरीर मजबूत बनता है, धातु पुष्ट होती है और संभोग करते समय चरम सुख की प्राप्ति होती है।
  24. 10 ग्राम भैंस का घी और 10 ग्राम सितोपलादि चूर्ण को किसी कांच या मिट्टी के बर्तन में भरकर रख लें। फिर उसी बर्तन में गाय या भैंस का दूह लें तथा उस दूध को पी लें। रोजाना सुबह और शाम 3-4 महीनों तक इस दूध का सेवन करने से हर प्रकार की कमजोरी दूर हो जाती है, धातु पुष्ट हो जाता है, बल-वीर्य की बढ़ोतरी होती है, स्तंभन शक्ति बढ़ती है और संभोग शक्ति में रुचि उत्पन्न होती है।
  25. सफेद चीनी, ग्वारपाठे का गूदा, घी और गेंहू के मैदा को बराबर मात्रा में एकसाथ मिलाकर हलवा बनाकर खाने से 21 दिन में ही पुरुष की नपुंसकता दूर हो जाती है।
  26. 25-25 ग्राम केसर, पीपल, जायफल, जावित्री, अकरकरा, सोंठ, लोंग और लाल चंदन, 6 ग्राम शुद्ध हिंगुल, 6 ग्राम शुद्ध गंधक और 90 ग्राम अफीम को ले लें। इन सारी औषधियों को कूटकर और छानकर लगभग 20-20 ग्राम की मात्रा में रख लें। फिर सबको एकसाथ मिलाकर हिंगुल, गंधक और अफीम के साथ खरल में डालकर पानी मिलाकर घोट लें। इसके पूरी तरह से घुट जाने पर 0.36 ग्राम और 0.36 ग्राम की गोलियां बना लें। यह एक गोली रोजाना सोने से पहले खाकर ऊपर से दूध पीने से संभोग करने की शक्ति तेज होती है और स्तंभन शक्ति बढ़ती है।
  27. सूखे बिदारीकंद को पीसकर उसमें ताजी बिदारीकंद के रस की 7 भावनाएं देकर उसमें मिश्री तथा शहद मिलाकर लगभग 20 ग्राम की मात्रा में नियमित रूप से 3 महीने तक सुबह के समय सेवन करने से बूढ़े लोग भी अपने शरीर में जवानों जैसी ताकत महसूस करते हैं।
  28. कुलंजन, सोंठ, मिश्री, अंजीर के बीज, गाजर के बीज, जरजीह के बीज और टिलयुन के बीजों को बराबर मात्रा में मिलाकर कूटकर और पीसकर छान लें। इसके बाद शहद और सफेद प्याज के पत्तों के रस को एक साथ मिलाकर किसी कलईदार बर्तन में भरकर हल्की आग पर पकाने के लिए रख दें। जब प्याज का रस जल जाए और सिर्फ शहद ही बाकी रह जाए तो इसमें पहले बताई गई औषधियों का तैयार किया हुआ चूर्ण मिला लें। इस मिश्रण को अपनी ताकत के अनुसार सेवन करने से संभोग करने की शक्ति और संभोग करने में रुचि बढ़ती है।
  29. लगभग 10-10 ग्राम जायफल, काला अनार, रुमी मस्तंगी, खस की जड़, बालछड़, दालचीनी, बबूल और शहद, 1 ग्राम कस्तूरी, 9 ग्राम सालममिश्री और 125 ग्राम मिश्री को एक साथ मिलाकर पीसकर छान लें। इस चूर्ण को 6 ग्राम की मात्रा में रोजाना सुबह और शाम 3-4 महीने तक सेवन करने से संभोग करने की शक्ति तेज हो जाती है।
  30. सूखे आंवलों को अच्छी तरह से कूटकर और पीसकर छान लें। इस चूर्ण में ताजे आंवलों के ताजा रस को उबालकर और सुखाकर किसी कांच की शीशी में भर लें। इस मिश्रण में शहद और मिश्री मिलाकर अपनी ताकत के अनुसार 3 महीने तक खाने से बूढ़े लोगों के शरीर में भी जवानों के जैसी संभोग करने की ताकत जाती है।
  31. तालमखाना, समुंद्रशोष, ढाक का गोंद, बीजबंद, बड़े गोखरू, तज और सफेद मूसली को एक साथ मिलाकर कूटकर और पीसकर छान लें। इसके बाद इस चूर्ण के बराबर ही इसमें पिसी हुई मिश्री मिलाकर रख लें। इस चूर्ण को रोजाना सुबह 6 ग्राम की मात्रा में फांककर उसके ऊपर से गाय का धार वाला ताजा दूध पीने से शरीर में ताकत और वीर्य की बढ़ोतरी होती है