मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

King of Maharaja Vikramadity

वो 'राजा' जिसे भूल गया हमारा इतिहास, भारत को बनाया था 'सोने की चिड़िया'
हिंदुस्तान के इतिहास में ऐसा बहुत कुछ छूट गया, जिसे लोग कभी नहीं जान पाएंगे। क्योंकि इनके सम्मान में बहुत कम जगहों पर ही वर्णन किया गया है। आप कह सकते हैं कि ये हमारे लिए शर्म की बात है कि जिसने देश को सोने की चिड़िया बनाया, आज उसके बारे में हम कुछ नहीं जानते।

हम बात कर रहे हैं महाराज विक्रमादित्य के बारे में, जिनके बारे में बहुत कम लोगों को ज्ञान है। इन्हीं के शासनकाल में भारत को सोने की चिड़िया बना था। इस काल को देश का स्वर्णिम काल भी माना जाता है।

महाराज विक्रमादित्य कौन थे???
उज्जैन के राजा गन्धर्व सैन थे। इनकी तीन संताने थी, सबसे बड़ी संतान एक लड़की थी मैनावती, दूसरी संतान लड़का भृतहरि और सबसे छोटी संतान वीर विक्रमादित्य। बहन मैनावती की शादी धारानगरी के राजा पद्म सैन के साथ कर दी गई। जिनका एक लड़का हुआ गोपीचन्द। आगे चलकर गोपीचन्द ने श्री ज्वालेन्दर नाथ जी से योग दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए। फिर मैनावती ने भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग दीक्षा ले ली।

आज हिंदुस्तान की संस्कृति और नाम केवल विक्रमादित्य के कारण अस्तित्व में है। अशोक मौर्य ने बौद्ध धर्म अपना लिया। बौद्ध बनकर 25 साल राज करने के बाद भारत में तब सनातन धर्म लगभग समाप्ति पर आ गया था।

विक्रमादित्य को क्यों याद रखना जरूरी?
शायद ही आपको पता हो कि रामायण, और महाभारत जैसे ग्रन्थ खो गए थे। महाराज विक्रमादित्य ने ही इनकी पुनः खोज करवा कर स्थापित किया। भगवान विष्णु और शिव जी के मंदिर बनवाए। सनातन धर्म की रक्षा की।

विक्रमादित्य के 9 रत्नों में से एक कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् को लिखा। जिसमें भारत का इतिहास है। अन्यथा भारत का इतिहास तो दूर की बात हम भगवान् कृष्ण और राम को ही खो चुके होते।

हमारे ग्रन्थ ही भारत में खोने के कगार पर आ गए थे। उस समय उज्जैन के राजा भृतहरि ने राज छोड़कर श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग की दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए। राज अपने छोटे भाई विक्रमदित्य को दे दिया। वीर विक्रमादित्य भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से गुरू दीक्षा लेकर राजपाट सम्भालने लगे और आज उन्ही के कारण सनातन धर्म की रक्षा हुई, हमारी संस्कृति सुरक्षित हुई।

विक्रमादित्य के शासन काल को भारत का स्वर्णिम युग कहा जाता है। विक्रमादित्य के काल में भारत का कपड़ा, विदेशी व्यपारी सोने के वजन से खरीदते थे। भारत में इतना सोना आ गया था कि विक्रमादित्य काल में सोने की सिक्के चलते थे।

हिन्दू कैलंडर की स्थापना भी विक्रमादित्य की देन
हिंदू धर्म में आज जो ज्योतिष गणना होती है हिन्दी सम्वंत, वार, तिथियां, राशि, नक्षत्र, गोचर आदि भी उन्ही की रचना है। वे बहुत ही पराक्रमी, बलशाली और बुद्धिमान राजा थे।

ऐसा कहा जाता है कि कई बार देवता भी उनसे न्याय करवाने आते थे। विक्रमादित्य के काल में हर नियम धर्मशास्त्र के हिसाब से बने होते थे। न्याय, राज सब धर्मशास्त्र के नियमों पर चलता था। विक्रमादित्य का काल राम राज के बाद सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इनके शासन काल में प्रजा धर्म और न्याय पर चलने वाली रही।

नोट: इतना सबकुछ होने के बाद भी आज हम भारत के सबसे महानतम राजा के बारे में कुछ भी नहीं जानते। आप इस लेख को शेयर करें ताकि राष्ट्र को उसको गौरव देने वाले के बारे में ज्ञान प्राप्त हो। वो जान सकें कि भारत को सोने की चिड़िया बनाने वाला देश का महान राजा कौन था ?

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

दिल्ली के पर शासन

आपको दिल्ली सल्तनत गुलाम वंश से नरेन्द्र मोदी तक के इतिहास से परिचित कराना चाहता हुँ

👉गुलाम वंश
1=1193 मुहम्मद  गौरी
2=1206 कुतुबुद्दीन ऐबक
3=1210 आराम शाह
4=1211 इल्तुतमिश
5=1236 रुकनुद्दीन फिरोज शाह
6=1236 रज़िया सुल्तान
7=1240 मुईज़ुद्दीन बहराम शाह
8=1242 अल्लाउदीन मसूद शाह
9=1246 नासिरुद्दीन महमूद 
10=1266 गियासुदीन बल्बन
11=1286 कै खुशरो
12=1287 मुइज़ुदिन कैकुबाद
13=1290 शमुद्दीन कैमुर्स
1290 गुलाम वंश समाप्त्
(शासन काल-97 वर्ष लगभग )

👉खिलजी वंश
1=1290 जलालुदद्दीन फ़िरोज़ खिलजी
2=1296
अल्लाउदीन खिलजी
4=1316 सहाबुद्दीन उमर शाह
5=1316 कुतुबुद्दीन मुबारक शाह
6=1320 नासिरुदीन खुसरो  शाह
7=1320 खिलजी वंश स्माप्त
(शासन काल-30 वर्ष लगभग )

*👉तुगलक  वंश*
1=1320 गयासुद्दीन तुगलक  प्रथम
2=1325 मुहम्मद बिन तुगलक दूसरा  
3=1351 फ़िरोज़ शाह तुगलक
4=1388 गयासुद्दीन तुगलक  दूसरा
5=1389 अबु बकर शाह
6=1389 मुहम्मद  तुगलक  तीसरा
7=1394 सिकंदर शाह पहला
8=1394 नासिरुदीन शाह दुसरा
9=1395 नसरत शाह
10=1399 नासिरुदीन महमद शाह दूसरा दुबारा सता पर
11=1413 दोलतशाह
1414 तुगलक  वंश समाप्त
(शासन काल-94वर्ष लगभग )

👉सैय्यद  वंश
1=1414 खिज्र खान
2=1421 मुइज़ुदिन मुबारक शाह दूसरा
3=1434 मुहमद शाह चौथा
4=1445 अल्लाउदीन आलम शाह
1451 सईद वंश समाप्त
(शासन काल-37वर्ष लगभग )

*👉लोदी वंश*
1=1451 बहलोल लोदी
2=1489 सिकंदर लोदी दूसरा
3=1517 इब्राहिम लोदी
1526 लोदी वंश समाप्त
(शासन काल-75 वर्ष लगभग )

👉मुगल वंश
1=1526 ज़ाहिरुदीन बाबर
2=1530 हुमायूं
1539 मुगल वंश मध्यांतर

👉सूरी वंश
1=1539 शेर शाह सूरी
2=1545 इस्लाम शाह सूरी
3=1552 महमूद  शाह सूरी
4=1553 इब्राहिम सूरी
5=1554 फिरहुज़् शाह सूरी
6=1554 मुबारक खान सूरी
7=1555 सिकंदर सूरी
सूरी वंश समाप्त,(शासन काल-16 वर्ष लगभग )

मोगल वंश पुनःप्रारंभ
1=1555 हुमायू दुबारा गाद्दी पर
2=1556 जलालुदीन अकबर
3=1605 जहांगीर सलीम
4=1628 शाहजहाँ
5=1659 औरंगज़ेब
6=1707 शाह आलम पहला
7=1712 जहादर शाह
8=1713 फारूखशियर
9=1719 रईफुदु राजत
10=1719 रईफुद दौला
11=1719 नेकुशीयार
12=1719 महमूद शाह
13=1748 अहमद शाह
14=1754 आलमगीर
15=1759 शाह आलम
16=1806 अकबर शाह
17=1837 बहादुर शाह जफर
1857 मोगल वंश समाप्त
(शासन काल-315 वर्ष लगभग )

👉ब्रिटिश राज (वाइसरॉय)
1=1858 लोर्ड केनिंग
2=1862 लोर्ड जेम्स ब्रूस एल्गिन
3=1864 लोर्ड जहॉन लोरेन्श
4=1869 लोर्ड रिचार्ड मेयो
5=1872 लोर्ड नोर्थबुक
6=1876 लोर्ड एडवर्ड लुटेन
7=1880 लोर्ड ज्योर्ज रिपन
8=1884 लोर्ड डफरिन
9=1888 लोर्ड हन्नी लैंसडोन
10=1894 लोर्ड विक्टर ब्रूस एल्गिन
11=1899 लोर्ड ज्योर्ज कर्झन
12=1905 लोर्ड गिल्बर्ट मिन्टो
13=1910 लोर्ड चार्ल्स हार्डिंज
14=1916 लोर्ड फ्रेडरिक सेल्मसफोर्ड
15=1921 लोर्ड रुक्स आईजेक रिडींग
16=1926 लोर्ड एडवर्ड इरविन
17=1931 लोर्ड फ्रिमेन वेलिंग्दन
18=1936 लोर्ड एलेक्जंद लिन्लिथगो
19=1943 लोर्ड आर्किबाल्ड वेवेल
20=1947 लोर्ड माउन्टबेटन
ब्रिटिस राज समाप्त

🇮🇳आजाद भारत,प्राइम मिनिस्टर🇮🇳
1=1947 जवाहरलाल नेहरू
2=1964 गुलजारीलाल नंदा
3=1964 लालबहादुर शास्त्री
4=1966 गुलजारीलाल नंदा
5=1966 इन्दिरा गांधी
6=1977 मोरारजी देसाई
7=1979 चरणसिंह
8=1980 इन्दिरा गांधी
9=1984 राजीव गांधी
10=1989 विश्वनाथ प्रतापसिंह
11=1990 चंद्रशेखर
12=1991 पी.वी.नरसिंह राव
13=अटल बिहारी वाजपेयी
14=1996 ऐच.डी.देवगौड़ा
15=1997 आई.के.गुजराल
16=1998 अटल बिहारी वाजपेयी
17=2004 डॉ.मनमोहनसिंह
18=2014 से  नरेन्द्र मोदी

सोमवार, 3 जुलाई 2017

श्रावणमास

*🚩रुद्राभिषेक से क्या क्या लाभ मिलता है ?🔱*

शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है अर्थात आप जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक करा रहे है उसके लिए किस द्रव्य का इस्तेमाल करना चाहिए का उल्लेख शिव पुराण में किया गया है उसका सविस्तार विवरण प्रस्तुत कर रहा हू और आप से अनुरोध है की आप इसी के अनुरूप रुद्राभिषेक कराये तो आपको पूर्ण लाभ मिलेगा।

श्लोक

जलेन वृष्टिमाप्नोति व्याधिशांत्यै कुशोदकै

दध्ना च पशुकामाय श्रिया इक्षुरसेन वै।

मध्वाज्येन धनार्थी स्यान्मुमुक्षुस्तीर्थवारिणा।

पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति पयसा चाभिषेचनात।।

बन्ध्या वा काकबंध्या वा मृतवत्सा यांगना।

जवरप्रकोपशांत्यर्थम् जलधारा शिवप्रिया।।

घृतधारा शिवे कार्या यावन्मन्त्रसहस्त्रकम्।

तदा वंशस्यविस्तारो जायते नात्र संशयः।

प्रमेह रोग शांत्यर्थम् प्राप्नुयात मान्सेप्सितम।

केवलं दुग्धधारा च वदा कार्या विशेषतः।

शर्करा मिश्रिता तत्र यदा बुद्धिर्जडा भवेत्।

श्रेष्ठा बुद्धिर्भवेत्तस्य कृपया शङ्करस्य च!!

सार्षपेनैव तैलेन शत्रुनाशो भवेदिह!

पापक्षयार्थी मधुना निर्व्याधिः सर्पिषा तथा।।

जीवनार्थी तू पयसा श्रीकामीक्षुरसेन वै।

पुत्रार्थी शर्करायास्तु रसेनार्चेतिछवं तथा।

महलिंगाभिषेकेन सुप्रीतः शंकरो मुदा।

कुर्याद्विधानं रुद्राणां यजुर्वेद्विनिर्मितम्।

अर्थात

जल से रुद्राभिषेक करने पर —               वृष्टि होती है।
कुशा जल से अभिषेक करने पर —        रोग, दुःख से छुटकारा मिलती है।
दही से अभिषेक करने पर —                  पशु, भवन तथा वाहन की प्राप्ति होती है।
गन्ने के रस से अभिषेक  करने पर —     लक्ष्मी प्राप्ति
मधु युक्त जल से अभिषेक करने पर — धन वृद्धि के लिए।
तीर्थ जल से अभिषेकक करने पर —     मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इत्र मिले जल से अभिषेक करने से —     बीमारी नष्ट होती है ।
दूध् से अभिषेककरने से   —                   पुत्र प्राप्ति,प्रमेह रोग की शान्ति तथा  मनोकामनाएं  पूर्ण
गंगाजल से अभिषेक करने से —             ज्वर ठीक हो जाता है।
दूध् शर्करा मिश्रित अभिषेक करने से — सद्बुद्धि प्राप्ति हेतू।
घी से अभिषेक करने से —                       वंश विस्तार होती है।
सरसों के तेल से अभिषेक करने से —      रोग तथा शत्रु का नाश होता है।
शुद्ध शहद रुद्राभिषेक करने से   —-         पाप क्षय हेतू।
इस प्रकार शिव के रूद्र रूप के पूजन और अभिषेक करने से जाने-अनजाने होने वाले पापाचरण से भक्तों को शीघ्र ही छुटकारा मिल जाता है और साधक में शिवत्व रूप सत्यं शिवम सुन्दरम् का उदय हो जाता है उसके बाद शिव के शुभाशीर्वाद सेसमृद्धि, धन-धान्य, विद्या और संतान की प्राप्ति के साथ-साथ सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाते हैं।

श्रावणमास

जय श्री राधे कृष्णा
इस सावन 17 साल बाद बनेंगे शुभ संयोग, सोमवार से शुरू होगा सावन

भगवान शिव को अतिप्रिय श्रवण (सावन) मास का शुभारंभ 10 जुलाई से हो रहा है और समापन 7 अगस्त को होगा। इस बार पांच सोमवारी पड़ेंगे।

पहली सोमवारी 10 जुलाई व आखिरी 7 अगस्त को है। धार्मिक मान्यता है कि सावन में भोलेनाथ के पूजन और अभिषेक से श्रद्धालुओं की हर मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

शिव पुराण के हवाले से बताया कि लगभग 17 वर्ष के बाद सावन मास में अलौकिक योग का संयोग बना है। सावन की शुरुआत चंद्राश योग में हो रहा है।

विरल संयोग बन रहा है कि सावन की शुरुआत व समापन सोमवारी से हो रही है। एक और संयोग बन रहा है। तीन वर्ष के बाद सावन में पांच सोमवारी का योग बना है। पांच सोमवारी के चलते ही महागजकेशरी योग का संयोग अति फलदायी है। विवाहित महिलाएं सुहाग के लिए और कुंवारी कन्याएं अच्छे पति के लिए सावन की सोमवारी का व्रत रखती हैं।

भगवान शिव को सावन का महीना, इसलिए प्रिय है क्योंकि इसी मास में माता पार्वती ने व्रत कर उन्हें पति के रूप में पाया था। देवी सती ने इसी मास में पिता दक्ष के घर में शरीर त्यागने के बाद हर जन्म में महादेव को अपना पति बनाने का प्रण लिया था।

कर्ज से मुक्ति: आक फूल में इत्र मिलाकर, धतूरे के फूल के साथ' पद और प्रतिष्ठा: 21 बेलपत्र में अबरख और भांग से ' विवाह बाधा दूर के लिए: भांग, नारियल पानी, कपरूर व शम्मी पत्ता' मांगलिक कन्याएं: खोया की मिठाई, बेलपत्र, गुलाबी अबरख' संतान के लिए: दूध और घी ' लक्ष्मी के लिए: दूध-ईख के रस से ' स्वास्थ्य के लिए: दूध व दही से ' शत्रु नाश के लिए: घी व सरसों तेल राशि के हिसाब से पूजन ' मेष, वृश्चिक: पांच बेलपत्र, अनार रस, भांग,धतूरा, नारियल पानी,' वृष, तुला: इत्र,आक फूल, शम्मी पत्ता' मिथुन, कन्या: गुलाबी अबरख, बेलपत्र ' कर्क: केला, भांग, बेल के रस' सिंह: गन्ने का रस, इत्र, गुलाबजल' धनु, मीन: कनैल फूल, दूब का रस, सरसों तेल' मकर, कुंभ: कपरूर व जल का मिश्रण, श्रीखंड चंदन, इत्र व बेलपत्र।

सावन में बेलपत्र, दूध, गंगाजल, भांग, धतूर, मदार फूल भोलेनाथ को अर्पित करने से शनि भी प्रसन्न होते हैं। ऐसा करने से शनि की ढैया व साढ़े साती से परेशान लोगों को लाभ होता है।

मंगलवार, 20 जून 2017

युगों का परिमाप

‘युग’ शब्द का अर्थ होता है एक निर्धारित संख्या के वर्षों की काल-अवधि। जैसे सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग आदि। आज में हम चारों युगों का वर्णन करेंगें। युग वर्णन से तात्पर्य है कि उस युग में किस प्रकार से व्यक्ति का जीवन, आयु, ऊँचाई, एवं उनमें होने वाले अवतारों के बारे में विस्तार से परिचय देना। प्रत्येक युग के वर्ष प्रमाण और उनकी विस्तृत जानकारी कुछ इस तरह है –

सत्ययुग- यह प्रथम युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –
इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 17,28,000 वर्ष होती है।
इस युग में मनुष्य की आयु – 1,00,000 वर्ष होती है ।
मनुष्य की लम्बाई – 32 फिट (लगभग) [21 हाथ]
सत्ययुग का तीर्थ – पुष्कर है ।
इस युग में पाप की मात्र – 0 विश्वा अर्थात् (0%) होती है ।
इस युग में पुण्य की मात्रा – 20 विश्वा अर्थात् (100%) होती है ।
इस युग के अवतार – मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह (सभी अमानवीय अवतार हुए) है ।
अवतार होने का कारण – शंखासुर का वध एंव वेदों का उद्धार, पृथ्वी का भार हरण, हरिण्याक्ष दैत्य का वध, हिरण्यकश्यपु का वध एवं प्रह्लाद को सुख देने के लिए।
इस युग की मुद्रा – रत्नमय है ।
इस युग के पात्र – स्वर्ण के है ।

‘त्रेतायुग’ – यह द्वितीय युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –
इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 12,96,000 वर्ष होती है ।
इस युग में मनुष्य की आयु – 10,000 वर्ष होती है ।
मनुष्य की लम्बाई – 21 फिट (लगभग) [ 14 हाथ ]
त्रेतायुग का तीर्थ – नैमिषारण्य है ।
इस युग में पाप की मात्रा – 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है ।
इस युग में पुण्य की मात्रा – 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है ।
इस युग के अवतार – वामन, परशुराम, राम (राजा दशरथ के घर)
अवतार होने के कारण – बलि का उद्धार कर पाताल भेजा, मदान्ध क्षत्रियों का संहार, रावण-वध एवं देवों को बन्धनमुक्त करने के लिए ।
इस युग की मुद्रा – स्वर्ण है ।
इस युग के पात्र – चाँदी के है ।
‘द्वापरयुग’ – यह तृतीय युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –
इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 8.64,000 वर्ष होती है ।
इस युग में मनुष्य की आयु – 1,000 होती है ।
मनुष्य लम्बाई – 11 फिट (लगभग) [ 7 हाथ ]
द्वापरयुग का तीर्थ – कुरुक्षेत्र है ।
इस युग में पाप की मात्रा – 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है ।
इस युग में पुण्य की मात्रा – 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है ।
इस युग के अवतार – कृष्ण, (देवकी के गर्भ से एंव नंद के घर पालन-पोषण), बुद्ध (राजा के घर)।
अवतार होने के कारण – कंसादि दुष्टो का संहार एंव गोपों की भलाई, दैत्यो को मोहित करने के लिए ।
इस युग की मुद्रा – चाँदी है ।
इस युग के पात्र – ताम्र के हैं ।

‘कलियुग’ – यह चतुर्थ युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –
इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 4,32,000 वर्ष होती है ।
इस युग में मनुष्य की आयु – 100 वर्ष होती है ।
मनुष्य की लम्बाई – 5.5 फिट (लगभग) [3.5 हाथ]
कलियुग का तीर्थ – गंगा है ।
इस युग में पाप की मात्रा – 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है ।
इस युग में पुण्य की मात्रा – 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है ।
इस युग के अवतार – कल्कि (ब्राह्मण विष्णु यश के घर) ।
अवतार होने के कारण – मनुष्य जाति के उद्धार अधर्मियों का विनाश एंव धर्म कि रक्षा के लिए।
इस युग की मुद्रा – लोहा है।
इस युग के पात्र – मिट्टी के है।

शुक्रवार, 2 जून 2017

मुस्लिम सिर्फ दाढ़ी रखते हैं मुछ नहीं!

हर धर्म को पहचानने के लिए हम सब ने अपने दिमाग में कई तस्वीरें बना रखी हैं। अगर किसी व्यक्ति ने पगड़ी पहन रखी हैं तो वह पंजाबी ही होगा या किसी ने अगर धोती पहनी हैं तो वह हिन्दू होगा या फिर किसी व्यक्ति ने अगर टोपी लगायी हैं और दाढ़ी रखी हैं तो वह मुसलमान ही होगा लेकिन यह सब हमारे दिमाग का सिर्फ एक मज़हबी फ़ितूर मात्र हैं।
पर कभी आपने सोचा कि मुस्लिम सिर्फ दाढ़ी क्यों रखते हैं मूछें नहीं? आईएं आज हम आप को बताते हैं मुस्लिम धर्म से जुड़ी एक दिलचस्प बात। दरअसल यह कहा जाता हैं कि हिन्दू धर्म ही सबसे पुराना और सनातन धर्म हैं। हिन्दू धर्म का इतिहास कितना पुराना हैं इस बात की पुष्टि अभी तक नहीं हुई हैं, वही इस्लाम धर्म लगभग 1400 साल पुराना हैं।
वेद व्यास जी अभी तक 18 पुराण लिख चुके हैं और भविष्य पुराण उनमे से एक हैं। हिन्दू धर्म के अंतर्गत कई तरह के पुराण और ग्रन्थ लिखे गए हैं और उन्ही ग्रन्थों में से एक भविष्य पुराण में इस्लाम से जुड़ी भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी। इस पुराण में लगभग 50000 श्लोक थे लेकिन तक्षशिला विश्व विद्यालय में रखे इस ग्रन्थ को मुग़ल शासन काल में जला दिया गया पर उस किताब में से 129 अध्याय और लगभग 14000 श्लोक बच गए थे।
इस किताब में यह पहले से ही उल्लेखित था कि उस वक़्त के तात्कालीन राजा हर्षवर्धन के साथ और कई राजा, अलाउदीन, तुगलक, तैमुर, बाबर, और अकबर जैसे मुगलों का इस काल आना होगा। इस पुराण में ईसाई धर्म के प्रमुख ईसा मसीह के जन्म का भी प्रमाण मिलता हैं।
लेकिन इससे पहले भी अपने भारत देश की शक्ति कम होती देख एक और राजा हुए, जो राजा भोज के नाम से जाने गए और उन्होंने तय किया कि अपनी मातृभूमि की रक्षा करने के लिए दुनिया जीतने निकलना ही पड़ेगा। अपनी दस हज़ार सेना को साथ लेकर कई विद्वानों और कालीदास जैसे बुध्हिजीवी राजा के साथ आगे बढ़े।
सिन्धु नदी पार करके गंधार और कशमीर में शठ राजाओं को हरा कर राजा भोज की सेना ईरान और अरब होते हुए मक्का पहुची। वहां के मरुस्थल में पहुच कर जब वहां उन्होंने एक शिवलिंग देखा तो उसकी पूजा करते हुए वह भगवान् शिव का ध्यान करने लगे।
भगवान् शिव भी राजा भोज की प्रार्थना सुनकर उनसे बात करने आये और उनसे कहा कि तुम्हे यहाँ नहीं आना चाहियें था वत्स। तुम्हे मक्केश्वेर (जिसे आज हम मक्का के नाम से जानते हैं) के बजाये उज्जैन महाकालेश्वेर को पूजना चाहियें। इस स्थान पर अब एक राक्षस त्रिपुरासुर, जिसका मैंने वध किया था, उसके मानने वालें लोगों को असुरराज बाली से संरक्षण प्राप्त हो रहा हैं और इस समुदाय का प्रमुख “महा-मद” (मद से भरा हुआ व्यक्ति जिसे आज मोहम्मद भी कहते हैं) उत्पात मचा रहा हैं इसलिए तुम इस मलेच्छ जगह से चले जाओ।
भगवान् शिव की बात सुनकर राजा भोज जब लौटने लगे तब “महा-मद” वहा आ गया और राजा भोज से कहा कि आप का आर्यधर्म विश्व का सर्वश्रेष्ट धर्म हैं, लेकिन मैं आपके शिव की मदद से ही एक ऐसे धर्म की स्थापना करूँगा जो अपनी क्रूरता के लिए जाना जायेगा। इसे मानने वालो को अपना लिंगाछेदन (खतना) कर के, बिना तिलक और बिना मुछों के सिर्फ दाढ़ी रखना अनिवार्य होगा। मेरा यह सम्प्रदाय उन्हें बहुत प्रिय होगा जिसे कुछ भी खाना (मांस) स्वीकार्य होगा और अपनी इस बात का यकीन दिलाने के लिए मैं आपके देश में आकर अपने मूंछ के बाल को त्याग दूँगा।
कश्मीर के हजरत बल मज्जिद में आज भी हजरत मोहम्मद के मुछों के उन बालों को सुरक्षित रखा गया हैं। हजरत के उस बाल को “मोई-ए-मुकद्दस” के नाम से जाना जाता हैं। हर मुस्लिमों के लिए उस बाल का दर्शन हो सके इसके लिए साल में एक या दो बार ही उस बक्से को खोला जाता हैं।

बुधवार, 24 मई 2017

मूल ज्ञान

33 करोड़ नहीं 33 कोटी देवी देवता हैँ हिंदू धर्म में ;

कोटि = प्रकार ।
देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते हैं ।

कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता ।

कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिंदू धर्म में :-

12 प्रकार हैँ :-
आदित्य , धाता, मित, आर्यमा,
शक्रा, वरुण, अँशभाग, विवास्वान, पूष, सविता, तवास्था, और विष्णु...!

8 प्रकार हैं :-
वासु:, धरध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।

11 प्रकार हैं :-
रुद्र: ,हरबहुरुप, त्रयँबक,
अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी,
रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।
                       एवँ
दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार ।

कुल :- 12+8+11+2=33 कोटी

         📜😇  दो पक्ष-

कृष्ण पक्ष ,
शुक्ल पक्ष !

         📜😇  तीन ऋण -

देव ऋण ,
पितृ ऋण ,
ऋषि ऋण !

         📜😇   चार युग -

सतयुग ,
त्रेतायुग ,
द्वापरयुग ,
कलियुग !

         📜😇  चार धाम -

द्वारिका ,
बद्रीनाथ ,
जगन्नाथ पुरी ,
रामेश्वरम धाम !

         📜😇   चारपीठ -

शारदा पीठ ( द्वारिका )
ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम )
गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) ,
शृंगेरीपीठ !

         📜😇 चार वेद-

ऋग्वेद ,
अथर्वेद ,
यजुर्वेद ,
सामवेद !

         📜😇  चार आश्रम -

ब्रह्मचर्य ,
गृहस्थ ,
वानप्रस्थ ,
संन्यास !

         📜😇 चार अंतःकरण -

मन ,
बुद्धि ,
चित्त ,
अहंकार !

         📜😇  पञ्च गव्य -

गाय का घी ,
दूध ,
दही ,
गोमूत्र ,
गोबर !

         📜😇  पञ्च देव -

गणेश ,
विष्णु ,
शिव ,
देवी ,
सूर्य !

         📜😇 पंच तत्त्व -

पृथ्वी ,
जल ,
अग्नि ,
वायु ,
आकाश !

         📜😇  छह दर्शन -

वैशेषिक ,
न्याय ,
सांख्य ,
योग ,
पूर्व मिसांसा ,
दक्षिण मिसांसा !

         📜😇  सप्त ऋषि -

विश्वामित्र ,
जमदाग्नि ,
भरद्वाज ,
गौतम ,
अत्री ,
वशिष्ठ और कश्यप!

         📜😇  सप्त पुरी -

अयोध्या पुरी ,
मथुरा पुरी ,
माया पुरी ( हरिद्वार ) ,
काशी ,
कांची
( शिन कांची - विष्णु कांची ) ,
अवंतिका और
द्वारिका पुरी !

         📜😊  आठ योग -

यम ,
नियम ,
आसन ,
प्राणायाम ,
प्रत्याहार ,
धारणा ,
ध्यान एवं
समािध !

         📜😇 आठ लक्ष्मी -

आग्घ ,
विद्या ,
सौभाग्य ,
अमृत ,
काम ,
सत्य ,
भोग ,एवं
योग लक्ष्मी !

         📜😇 नव दुर्गा --

शैल पुत्री ,
ब्रह्मचारिणी ,
चंद्रघंटा ,
कुष्मांडा ,
स्कंदमाता ,
कात्यायिनी ,
कालरात्रि ,
महागौरी एवं
सिद्धिदात्री !

         📜😇   दस दिशाएं -

पूर्व ,
पश्चिम ,
उत्तर ,
दक्षिण ,
ईशान ,
नैऋत्य ,
वायव्य ,
अग्नि
आकाश एवं
पाताल !

         📜😇  मुख्य ११ अवतार -

मत्स्य ,
कच्छप ,
वराह ,
नरसिंह ,
वामन ,
परशुराम ,
श्री राम ,
कृष्ण ,
बलराम ,
बुद्ध ,
एवं कल्कि !

         📜😇 बारह मास -

चैत्र ,
वैशाख ,
ज्येष्ठ ,
अषाढ ,
श्रावण ,
भाद्रपद ,
अश्विन ,
कार्तिक ,
मार्गशीर्ष ,
पौष ,
माघ ,
फागुन !

         📜😇  बारह राशी -

मेष ,
वृषभ ,
मिथुन ,
कर्क ,
सिंह ,
कन्या ,
तुला ,
वृश्चिक ,
धनु ,
मकर ,
कुंभ ,
कन्या !

         📜😇 बारह ज्योतिर्लिंग -

सोमनाथ ,
मल्लिकार्जुन ,
महाकाल ,
ओमकारेश्वर ,
बैजनाथ ,
रामेश्वरम ,
विश्वनाथ ,
त्र्यंबकेश्वर ,
केदारनाथ ,
घुष्नेश्वर ,
भीमाशंकर ,
नागेश्वर !

         📜😇 पंद्रह तिथियाँ -

प्रतिपदा ,
द्वितीय ,
तृतीय ,
चतुर्थी ,
पंचमी ,
षष्ठी ,
सप्तमी ,
अष्टमी ,
नवमी ,
दशमी ,
एकादशी ,
द्वादशी ,
त्रयोदशी ,
चतुर्दशी ,
पूर्णिमा ,
अमावास्या !

         📜😇 स्मृतियां -

मनु ,
विष्णु ,
अत्री ,
हारीत ,
याज्ञवल्क्य ,
उशना ,
अंगीरा ,
यम ,
आपस्तम्ब ,
सर्वत ,
कात्यायन ,
ब्रहस्पति ,
पराशर ,
व्यास ,
शांख्य ,
लिखित ,
दक्ष ,
शातातप ,
वशिष्ठ !