गुरुवार, 24 मई 2018

शूर्पणखा और रावण

शूर्पणखा भी चाहती थी रावण का सर्वनाश, जानिए रामायण से जुड़ी ऐसी ही कुछ रोचक बातें:

सनातन धर्म में रामायण का महत्व सर्वविदित है.. ये सिर्फ एक पौराणिक कथा नही बल्कि जीवन का सार है। मूल कथा के साथ इसमे वर्णित हर प्रसंग बेहद अनमोल है जबकि हममें से अधिकांश लोग उनके बारे में नही जानते हैं। दरअसल श्रीराम का वनवास, सीता का हरण और रावण वध जैसे प्रमुख घटनाए तो हर कोई जानता है पर कई सारे ऐसे प्रसंग भी जिनसे लोग अनभिज्ञ हैं और आज हम आपको ऐसी ही अनसुनी और रोचक बातों के बारे में बताने जा रहे हैं।

असल में भगवान राम को समर्पित कई ग्रन्थ लिखे गए है पर उन सब में वाल्मीकि रचित रामायण सबसे प्रामाणिक मानी जाती है और रामायण से जुड़ी कुछ ऐसी बातें हैं जिनका वर्णन केवल वाल्मीकि कृत रामायण में है। हम आपको वाल्मीकि रचित रामायण के कुछ बातों के बारे में बताने जा रहे हैं।

आज तक हम यही सुनते आ रहे हैं कि सीता का भव्य स्वयंवर आयोजित हुआ था जिसको श्रीराम ने जीता था पर आपको बता दें कि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में सीता स्वयंवर का कोई वर्णन नहीं है। जी हां, वाल्मीकि कृत रामायण के अनुसार अपने गुरू ऋषि विश्वामित्र के साथ भगवान राम व लक्ष्मण मिथिला पहुंचे थे और वहां विश्वामित्र ने ही राजा जनक से श्रीराम को वह शिवधनुष दिखाने के लिए कहा और तब श्रीराम ने जैसे ही उस धनुष देखने के लिए उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाया तो वह टूट गया। चूंकि राजा जनक ने यह प्रण किया था कि जो भी उस शिव धनुष को उठा कर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा उससे ही वे अपनी पुत्री सीता का विवाह करेंगे. ऐसे में जनक ने सीता का विवाह श्रीराम के साथ कर दिया।

रावण को मिले उस श्राप के विषय में तो आपने सुना होगा जिसकी वजह से उसे किसी पराई स्त्री को उसकी इच्छा के बिना स्पर्श करने पर सर्वनाश होने की चेतावनी मिली थी । उस प्रसंग के बारे में तरह-तरह की मान्यताएं प्रचलित है लेकिन वाल्मीकि के रामायण में उसके बारे में ये लिखा गया है कि जब विश्व विजय करने की मंशा लिए रावण स्वर्ग लोक पहुंचा तो वहां उसे अप्सरा रंभा दिखाई पड़ा और उसकी नियत खराब हो गई। उसने अपनी वासना पूरी करने के लिए रम्भा को पकड़ लिया। तब रम्भा ने बताया कि आप मेरे साथ ऐसा अनाचार ना करें क्योंकि इस समय मैं आपके बड़े भाई कुबेर के बेटे नलकुबेर की सेवा में हूं और इस तरह मैं आपके लिए पुत्रवधू के समान हूं, लेकिन रम्भा के ये कहने पर भी रावण नहीं माना और रंभा से दुराचार किया। ऐसे में जब ये बात नलकुबेर को पता चली तो उसने उसी क्षण रावण को श्राप दे दिया कि आगे से अगर रावण ने किसी पराई स्त्री को बिना उसकी इच्छा के उसे स्पर्श किया तो उसका मस्तक सौ टुकड़ों में खंडित हो जाएगा।

शूर्पणखा के बारे में तो आप जानते ही हैं जिसके लिए रावण ने श्रीराम से बैर पाल लिया था पर क्या आपको पता है कि शूर्पणखा स्वयं भी रावण का विनाश ही चाहती थी। दरअसल रावण की बहन शूर्पणखा का पति था  विद्युतजिव्ह, जो कि कालकेय नाम के राजा का सेनापति था और जब रावण जब विश्व विजय के लिए निकला तो उसका युद्ध कालकेय से भी हुआ था. उसी युद्ध में रावण ने शूर्पणखा के पति विद्युतजिव्ह का वध कर दिया। इससे क्रोधित होकर शूर्पणखा ने उसी समय मन ही मन रावण को श्राप दे दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा।

कैकयी को दिए वचन के कारण राजा दशरथ को श्रीराम को ना चाह कर भी वनवास जाने का आदेश देना पड़ा था। पर वो किसी भी स्थिति में राम को खुद से दूर और वनवास नही जाने देना चाहते थे पर चूंकि वो वचनबद्ध थे। इसलिए जब राम को रोकने का कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने श्रीराम से आग्रह किया कि तुम मुझे बंदी बनाकर स्वयं राजा बन जाओ।

ये तो आप जानते ही है रावण ने कैसे तीनो लोक पर विजय पाने के लिए देवताओं से युद्ध किया था लेकिन क्या आपको ये पता है कि उसने यमराज से भी युद्ध किया था। जी हां, वाल्मीकि रचित रामायण के अनुसार रावण जब विश्व विजय पर निकला तो वह यमलोक भी जा पहुंचा और वहां उसने यमराज को युद्ध की चुनौती दी और तब यमराज और रावण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। जिसमें यमराज ने रावण के प्राण लेने के लिए कालदण्ड का प्रयोग करना चाहा था पर ब्रह्मा जी ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया था क्योंकि रावण का वध किसी देवता के हाथों संभव नहीं था।

इस प्रसंग के बारे में शायद ही आप जानते होंगे कि जब रावण ने सीता का हरण कर उन्हे अपनी अशोक वाटिका में बंदी बला डाला तो उसी रात को ब्रह्मा जी के कहने पर देवराज इंद्र ने माता सीता को सम्बल देने के लिए खीर खिलाई थी। वाल्मीकि रचित रामायण के अनुसार देवराज ने पहले अशोक वाटिका में मौजूद सभी राक्षसों को मोहित कर सुला दिया और उसके बाद माता सीता को खीर अर्पित की, जिसके खाने से सीता मां की शांतचित हो गई।

सोमवार, 21 मई 2018

अशोक

पेड़-पौधों के अलग-अलग उपायों से भी घर-परिवार की धन संबंधी और अन्य परेशानियों को दूर किया जा सकता है। यहां जानिए एक ऐसे वृक्ष
के चमत्कारी उपाय, जो हमारे घर के आसपास
आसानी से मिल जाता है।

इस पेड़ के पत्तों को घर के दरवाजे पर लगाया जाता है। एक बार दरवाजे पर ये पत्ते लगा दिए
जाए तो छ: माह तक वे चमत्कारी असर दिखाते हैं। वंदनवार के रूप में लगाएं पत्तों को
ये चमत्कारी वृक्ष है अशोक।

अशोक के पत्ते घर के दरवाजे पर वंदनवार के रूप में लगाए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जिस घर के मुख्य द्वार पर अशोक के पत्तों की वंदनवार
लगी होती है।

वहां किसी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव नहीं होता है। घर का वातावरण पवित्र और सकारात्मक बना रहता है। इन पत्तों का उपयोग
सभी प्रकार के मांगलिक और धार्मिक कार्यों में मुख्य रूप से किया जाता है।

सदाबहार है अशोक

अशोक का वृक्ष सदाबहार है, हर मौसम में यह हरा-भरा रहता है। अशोक के पत्तों का उपयोग घर
की सजावट में और अन्य पूजन संबंधी कार्यों में किया जाता है। किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य अशोक के पत्तों की वंदनवार के बिना अधूरे
ही रहते हैं। इन पत्तों के कारण घर का वातावरण
भी धार्मिक और पवित्र दिखाई देता है।

रविवार, 20 मई 2018

जड़ है कमाल की औषधि

धतूरे की जड़ : अश्लेषा नक्षत्र में धतूरे की जड़ लाकर घर में रखें, घर में सर्प नहीं आएगा और आएगा भी तो कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा।

बेहड़े का पत्ता : पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में बेहड़े का पत्ता लाकर घर में रखें, घर ऊपरी हवाओं के प्रभाव से मुक्त रहेगा।

नीबू की जड़ : उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में नीबू की जड़ लाकर उसे गाय के दूध में मिलाकर निःसंतान स्त्री को पिलाएं, उसे  की प्राप्ति होगी।

चंपा की जड़ : हस्त नक्षत्र में चंपा की जड़ लाकर बच्चे के गले में बांधें, बच्चे की प्रेत बाधा तथा नजर दोष से रक्षा होगी।

चमेली की जड़ : अनुराधा नक्षत्र में चमेली की जड़ गले में बांधें, शत्रु भी मित्र हो जाएंगे।

काले एरंड की जड़ : श्रवण नक्षत्र में एरंड की जड़ लाकर निःसंतान स्त्री के गले में बांधें, उसे संतान की प्राप्ति होगी।

तुलसी की जड़ : पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र में तुलसी की जड़ लाकर मस्तिष्क पर रखें, अग्निभय से मुक्ति मिलेगी।

विल्व पत्र : अश्विनी नक्षत्र वाले दिन एक रंग वाली गाय के दूध में बेल के पत्ते डालकर वह दूघ निःसंतान स्त्री को पिलाने से उसे संतान की प्राप्ति होती है।

अपामार्ग की जड़ : अश्विनी नक्षत्र में अपामार्ग की जड़ लाकर इसे तावीज में रखकर किसी सभा में जाएं, सभा के लोग वशीभूत होंगे।

नागर बेल का पत्ता : यदि घर में किसी वस्तु की चोरी हो गई हो, तो भरणी नक्षत्र में नागर बेल का पत्ता लाकर उस पर कत्था लगाकर व सुपारी डालकर चोरी वाले स्थान पर रखें, चोरी की गई वस्तु का पला चला जाएगा।

संखाहुली की जड़ : भरणी नक्षत्र में संखाहुली की जड़ लाकर तावीज में पहनें तो विपरीत लिंग वाले प्राणी आपसे प्रभावित होंगे।

आक की जड़ : कोर्ट कचहरी के मामलों में विजय हेतु आर्द्रा नक्षत्र में आक की जड़ लाकर तावीज की तरह गले में बांधें।

दूधी की जड़ : सुख की प्राप्ति के लिए पुनर्वसु नक्षत्र में दूधी की जड़ लाकर शरीर में लगाएं।

शंख पुष्पी : पुष्य नक्षत्र में शंखपुष्पी लाकर चांदी की डिविया में रखकर तिजोरी में रखें, धन की वृद्धि होगी।

बरगद का पत्ता : अश्लेषा नक्षत्र में बरगद का पत्ता लाकर अन्न भंडार में रखें, भंडार भरा रहेगा।

शनिवार, 12 मई 2018

श्री राम जी की बहन शांता

श्रीराम की दो बहनें भी थी एक शांता और दूसरी कुकबी। हम यहां आपको शांता के बारे में बताएंगे।
अयोध्या के राजा चक्रवर्ती दशरथ और कौशल्या की पुत्री शांता थीं, लेकिन पैदा होने के कुछ वर्षों बाद कुछ कारणों से राजा दशरथ ने शांता को अंगदेश के राजा रोमपद को दे दिया था।

भगवान राम की बड़ी बहन का पालन-पोषण राजा रोमपद और उनकी पत्नी वर्षिणी ने किया, जो महारानी कौशल्या की बहन अर्थात राम की मौसी थीं।


इस संबंध में तीन कथाएं हैं:
पहली :वर्षिणी नि:संतान थीं तथा एक बार अयोध्या में उन्होंने हंसी-हंसी में ही बच्चे की मांग की। दशरथ भी मान गए। रघुकुल का दिया गया वचन निभाने के लिए शांता अंगदेश की राजकुमारी बन गईं। शांता वेद, कला तथा शिल्प में पारंगत थीं और वे अत्यधिक सुंदर भी थीं।

दूसरी :लोककथा अनुसार शांता जब पैदा हुई, तब अयोध्‍या में अकाल पड़ा और 12 वर्षों तक धरती धूल-धूल हो गई। चिंतित राजा को सलाह दी गई कि उनकी पुत्री शां‍ता ही अकाल का कारण है। राजा दशरथ ने अकाल दूर करने के लिए अपनी पुत्री शांता को वर्षिणी को दान कर दिया। उसके बाद शां‍ता कभी अयोध्‍या नहीं आई। कहते हैं कि दशरथ उसे अयोध्या बुलाने से डरते थे इसलिए कि कहीं फिर से अकाल नहीं पड़ जाए।

तीसरी कथा :कुछ लोग मानते थे कि राजा दशरथ ने शां‍ता को सिर्फ इसलिए गोद दे दिया था, क्‍योंकि वह लड़की होने की वजह से उनकी उत्‍तराधिकारी नहीं बन सकती थीं।

शान्ता का विवाह किससे हुआ, जानिए अगले पन्ने पर...

शांता का विवाह महर्षि विभाण्डक के पुत्र ऋंग ऋषि से हुआ। एक दिन जब विभाण्डक नदी में स्नान कर रहे थे, तब नदी में ही उनका वीर्यपात हो गया। उस जल को एक हिरणी ने पी लिया था जिसके फलस्वरूप ऋंग ऋषि का जन्म हुआ था।

एक बार एक ब्राह्मण अपने क्षेत्र में फसल की पैदावार के लिए मदद करने के लिए राजा रोमपद के पास गया, तो राजा ने उसकी बात पर ध्‍यान नहीं दिया। अपने भक्‍त की बेइज्‍जती पर गुस्‍साए इंद्रदेव ने बारिश नहीं होने दी, जिस वजह से सूखा पड़ गया। तब राजा ने ऋंग ऋषि को यज्ञ करने के लिए बुलाया। यज्ञ के बाद भारी वर्षा हुई। जनता इतनी खुश हुई कि अंगदेश में जश्‍न का माहौल बन गया। तभी वर्षिणी और रोमपद ने अपनी गोद ली हुई बेटी शां‍ता का हाथ ऋंग ऋषि को देने का फैसला किया।

दशरथ ने पुत्र की कामना से जब बुलाया अपने दामाद को...

राजा दशरथ और इनकी तीनों रानियां इस बात को लेकर चिंतित रहती थीं कि पुत्र नहीं होने पर उत्तराधिकारी कौन होगा। इनकी चिंता दूर करने के लिए ऋषि वशिष्ठ सलाह देते हैं कि आप अपने दामाद ऋंग ऋषि से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाएं। इससे पुत्र की प्राप्ति होगी।

दशरथ ने उनके मंत्री सुमंत की सलाह पर पुत्रकामेष्ठि यज्ञ में महान ऋषियों को बुलाया। इस यज्ञ में दशरथ ने ऋंग ऋषि को भी बुलाया। ऋंग ऋषि एक पुण्य आत्मा थे तथा जहां वे पांव रखते थे वहां यश होता था। सुमंत ने ऋंग को मुख्य ऋत्विक बनने के लिए कहा। दशरथ ने आयोजन करने का आदेश दिया।

पहले तो ऋंग ऋषि ने यज्ञ करने से इंकार किया लेकिन बाद में शांता के कहने पर ही ऋंग ऋषि राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करने के लिए तैयार हुए थे। 

शांता के आने से हुई अयोध्या में वर्षा, अगले पन्ने पर

दशरथ ने केवल ऋंग ऋषि (उनके दामाद) को ही आमंत्रित किया लेकिन ऋंग ऋषि ने कहा कि मैं अकेला नहीं आ सकता। मेरी पत्नी शांता को भी आना पड़ेगा। ऋंग ऋषि की यह बात जानकर राजा दशरथ विचार में पड़ गए, क्योंकि उनके मन में अभी तक दहशत थी कि कहीं शांता के अयोध्या में आने से फिर से अकाल नहीं पड़ जाए।

लेकिन जब पुत्र की कामना से पुत्र कामेष्ठि यज्ञ के दौरान उन्‍होंने अपने दामाद ऋंग ऋषि को बुलाया, तो दामाद ने शां‍ता के बिना आने से इंकार कर दिया।

तब पुत्र कामना में आतुर दशरथ ने संदेश भिजवाया कि शांता भी आ जाए। शांता तथा ऋंग ऋषि अयोध्या पहुंचे। शांता के पहुंचते ही अयोध्या में वर्षा होने लगी और फूल बरसने लगे। शांता ने दशरथ के चरण स्पर्श किए। दशरथ ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि 'हे देवी, आप कौन हैं? आपके पांव रखते ही चारों ओर वसंत छा गया है।' जब माता-पिता (दशरथ और कौशल्या) विस्मित थे कि वो कौन है? तब शांता ने बताया कि 'वो उनकी पुत्री शांता है।' दशरथ और कौशल्या यह जानकर अधिक प्रसन्न हुए। वर्षों बाद दोनों ने अपनी बेटी को देखा था।

दशरथ ने दोनों को ससम्मान आसन दिया और उन दोनों की पूजा-आरती की। तब ऋंग ऋषि ने पुत्रकामेष्ठि यज्ञ किया तथा इसी से भगवान राम तथा शांता के अन्य भाइयों का जन्म हुआ।

यज्ञ कराने से ऋंग ऋषि का पुण्य नष्ट हो गया तब उन्होंने क्या किया...

कहते हैं कि पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने वाले का जीवनभर का पुण्य इस यज्ञ की आहुति में नष्ट हो जाता है। इस पुण्य के बदले ही राजा दशरथ को पुत्रों की प्राप्ति हुई। राजा दशरथ ने ऋंग ऋषि को यज्ञ करवाने के बदले बहुत-सा धन दिया जिससे ऋंग ऋषि के पुत्र और कन्या का भरण-पोषण हुआ और यज्ञ से प्राप्त खीर से राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। ऋंग ऋषि फिर से पुण्य अर्जित करने के लिए वन में जाकर तपस्या करने लगे।

रामायण और रामचरित मानस में शांता के चित्र क्यों नहीं...

जनता के समक्षशान्ताने कभी भी किसी को नहीं पता चलने दिया कि वो राजा दशरथ और कौशल्‍या की पुत्री हैं। यही कारण है कि रामायण या रामचरित मानस में उनका खास उल्लेख नहीं मिलता है।

दुख तो तब हुआ शान्ता को जब कोई भाई मिलने नहीं आया...

कहते हैं कि जीवनभर शांता राह देखती रही अपने भाइयों की कि वे कभी तो उससे मिलने आएंगे, पर कोई नहीं गया उसका हाल-चाल जानने। मर्यादा पुरुषोत्तम भी नहीं, शायद वे भी रामराज्‍य में अकाल पड़ने से डरते थे।

कहते हैं कि वन जाते समय भगवान राम अपनी बहन के आश्रम के पास से भी गुजरे थे। तनिक रुक जाते और बहन को दर्शन ही दे देते। बिन बुलाए आने को राजी नहीं थी शांता। सती माता की कथा सुन चुकी थी बचपन में, दशरथ से।

अगले पन्ने पर कौन से राजपूत हैं ऋंग ऋषि के वंशज...

ऐसा माना जाता है कि ऋंग ऋषि और शांता का वंश ही आगे चलकर सेंगर राजपूत बना। 

विभीषण की माता कौशिल्या

विभीषण की माता कौसल्या और पिता दशरथ?
पहली कथा सुनने में मिलती है”:―
कि कैकसी राक्षसी और ऋषि विश्वश्रवा से उत्पन्न हुए रावण एवं कुंभकर्ण, ये दोनों पुत्र दुष्टकर्मा राक्षस थे। किंतु इन्हीं ऋषि के आशीर्वाद के कारण, कैकसी का तृतीय पुत्र विभीषण, अपने पिता के समान ब्राह्मण वंशीय एवं धर्मात्मा उत्पन्न हुए।

“अब दूसरी कथा को समझते हैं”:―
यह कथा भारत में नहीं अपितु श्रीलंका में विख्यात है। कहते हैं जब रावण को इस बात की जानकारी हुई की कौशिल्या का पुत्र उसकी और उसके परिवार की मृत्यु का कारण बनेगा, तब उसने अपने सैनिकों से कहकर कौशल प्रदेश के राजा कौशिक की पुत्री कौशिल्या जी को विवाह मंडप से अपहरण करवा कर उन्हें लंका के सिंहल द्वीप में सुरक्षित अपने निगरानी में रखता है।

एक बार दशरथ जी सिंहल द्वीप पहुंचे। वहां दशरथ जी का मिलन कौशल्या से हुआ। जिस कारण कौशिल्या जी गर्भवती हो जाती हैं। इधर दशरथ जी कौशिल्या जी से विवाह का प्रस्ताव रखते हैं। तब कौशिल्या जी कहती हैं इस समय मैं लंका के राजा रावण के संरक्षण में हूं। यदि वह आदेश देता है तो अवश्य आपसे विवाह करूंगी। यह सुनकर दशरथ जी अयोध्या वापस आ जाते हैं। समय बीतने पर जब कौशिल्या जी को पुत्र होता है तब कौशिल्या जी ने यह खबर दशरथ जी तक भिजवाया। यह सुन दशरथ जी सुमन्त जी को साथ लेकर तुरत चल पड़े, जब दशरथ जी कौशिल्या जी से मिलते हैं, तब कौशिल्या जी ने अपने पर बीती सारी बात बताई।

तब दशरथ जी ने विवाह करने का फ़ैसला लिया और इस प्रकार ब्राह्मण होने के कारण सुमन्त जी ने स्वयं दोनों का विवाह संस्कार सम्पन्न कराया। विवाह से पहले उत्पन्न संतान को समाज धर्म के कारण त्याग कर दिया, और अयोध्या वापस लौट आए।

विश्वश्रवा की पत्नी मालिनी एक गगन चरी थी। वह आकाश मार्ग से उड़ रही थी, तभी उसने उस बच्चे को देखा। भूख से व्याकुल होने के कारण बालक को निगल गई। विश्वश्रवा ने ध्यान लगाकर देखा तो इस बालक को योग बल के द्वारा अपने दूसरी पत्नी मालिनी के गर्भ में स्थापित किया और इस प्रकार विभीषण जी का जन्म हुआ। विश्वश्रवा ने अपनी पत्नी मालिनी को बताया है कि वह बालक राक्षस वंश का कुल दीपक होगा इसलिए इस बालक का जीवित रहना जरूरी है। आगे चलकर वह परमात्मा राम का भक्त होगा।

कथा का प्रसंग सटीक नहीं इस कथा में कई प्रश्न खड़े हो सकते हैं । जैसे कि भगवान श्री राम के पिता राजा चक्रवर्ती दशरथ कभी नन्हें शिशु को निर्जन द्वीप में त्याग कर जा ही नहीं सकते आदि आदि। इसलिए मेरी दृष्टि में यह कथा कपोल कल्पित है।

भविष्य में 14 रामायण रचे हुए हैं। कंबन रामायण से लेकर तुलसी कृत रामायण और  अध्यात्म रामायण में  प्राचीन कथाएं दी गई हैं। शास्त्र परंपरा के अनुसार विभीषण मालिनी का पुत्र हुआ, यह कथा स्वामी करपात्री जी की कथा में सुनी है।

रविवार, 11 मार्च 2018

कक्षीवान

एक बार कक्षीवान ऋषि प्रियमेध ऋषिके पास गए तथा बोले, `प्रियमेध, मेरी एक पहेली सुलझाओ । ऐसी कौन-सी वस्तु है जिसे जलानेपर प्रकाश नहीं उत्पन्न होता ?' प्रियमेधने बहुत सोचा; परन्तु वे पहेली नहीं सुलझा पाए । क्योंकि, किसी वस्तुको जलानेपर उससे थोडा तो भी प्रकाश उत्पन्न होता ही है । तब उन्होंने कहा, `मुझे इसका उत्तर नहीं ज्ञात है । परन्तु, आगे मेरे वंशमें कोई ऐसा विद्वान अवश्य जन्म लेगा, जो इसका उत्तर देगा ।'

कक्षीवान ऋषिके पास नेवलेके चमडेकी एक बडी-सी थैली थी । उस थैलीमें प्रियंगु (पिप्पली), चावल एवं अधिकता नामक अनाज भरा था । वे प्रतिवर्ष उसमेंसे एक-एक दाना निकालकर फेंक देते थे । अनाजके सभी दाने समाप्त होनेतक उन्हें जीवन प्राप्त था । परन्तु, प्रियमेधका जीवन कक्षीवान इतना नहीं था । उनके मरनेके पश्चात उनके पुत्रने उनका कार्य हाथमें लिया । आगे वह भी बूढा होकर मृत्युको प्राप्त हुआ । इस प्रकार, प्रियमेधके पश्चात नौवीं पीढीमें साकमश्वका जन्म हुआ ।

परन्तु, कक्षीवानकी अनाजकी थैलीमें अब भी दाने शेष थे, इसलिए वे जीवित रहकर अपनी पहेलीके उत्तरकी प्रतीक्षा कर रहे थे । अब उनकी अवस्था लगभग नौ सौ वर्ष हो गई थी । किन्तु, अभी भी उनकी पहेली नहीं सुलझ पायी थी ।

साकमश्वको इस पहेलीने व्याकुल कर दिया था । उसने निश्चय किया कि मैं इस पहेलीको सुलझाऊंगा । उसी समय उसे एक `साम' सूझा । उसने वह साम गाया और पहेलीका उत्तर मिल गया ।

तब, वह तुरन्त बडे आनन्दके साथ कक्षीवानके पास गया । कक्षीवानने उसे दूरसे ही दौडकर आते देखा, तो उन्हें उसके दौडकर आनेका कारण समझमें आ गया । उन्होंने अपने शिष्यसे कहा, `अरे, मेरी यह थैली नदीमें छोड दो । मेरी पहेली सुलझाकर मुझे झुकानेवाला मनुष्य मुझे दिखाई दे रहा है । अब जीनेसे कोई लाभ नहीं ।'

`साकमश्व कक्षीवानके निकट आकर बोला, `जो मनुष्य केवल `ऋचा' गाता है, `साम' नहीं गाता, उसका गायन उस अग्नि जैसा है; जिससे प्रकाश नहीं उत्पन्न होता । परन्तु, जो `ऋचा' के पश्चात तुरन्त `साम' भी गाता है, उसका गायन उस अग्नि-जैसा है, जिससे प्रकाश भी उत्पन्न होता है । साकमश्वको जब `साम'का स्फुरण हुआ तथा उसने उसे गाया, तब उसे `साम'के तेजकी अनुभूति हुई । संगीतरहित मन्त्रपठनसे कोई लाभ नहीं है, यह उसने खोज निकाला था ।

साकमश्वने आगे कहा, `यह मेरा उत्तर है । मेरे पिताका भी यही उत्तर है ।' ऐसा कहकर उसने प्रियमेधतक अपने सभी पूर्वजोंके नाम लिए तथा अपने पूर्वजोंका कलंक धो दिया ।

तबसे, यज्ञमें ऋग्वेदकी ऋचाओंके साथ सामवेदके सामका भी गायन आरम्भ हुआ एवं काव्यको संगीतका साथ मिला ।

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

भक्त मानिदास माली

सन् 1543 के लगभग उड़ीसा के जगन्नाथधाम में जन्मे थे मणिदास माली। निर्धनता के कारण इन्हें पढ़ाई का अवसर नहीं मिल सका, किंतु जगन्नाथ भगवान् की भक्ति में इनका हृदय पूरी तरह से रंग गया। ये अपने छोटे-से खेत में विभिन्न प्रकार के फूल और सब्जियाँ उगाते थे। प्रतिदिन रंग-बिरंगे सुंदर-सुंदर फूलों की मालाएँ बनाते और उन्हें लेकर जगन्नाथजी के मंदिर में जाते। सबसे पहले एक माला अपने इष्टदेव जगन्नाथ भगवान् को समर्पित करते और फिर शेष मालाएँ प्रभु के दर्शन करने के लिए आने वाले भक्तों को बेच देते। साधुओं के सत्संग से इन्होंने यह सच्ची शिक्षा ग्रहण की थी कि दीन-दुःखी प्राणियों पर दया करनी चाहिए और पाप कर्मों का त्याग करके भगवद्भजन करना चाहिए।

इसलिए मणिदासजी अपनी आय का आधा अंश संत-महात्माओं और भूखे प्राणियों की सेवा व भोजन पर खर्च करते।

कुछ समय बाद मणिदास की पत्नी और पुत्रों को किसी घातक बीमारी ने अपनी चपेट में ले लिया और एक-एक करके उनकी मृत्यु हो गई। किंतु मणिदास ने इसमें भी अपने जगन्नाथ भगवान् की कृपा के दर्शन किए। मृत परिजनों का दाह संस्कार करने के बाद वे जगन्नाथ मंदिर की ओर हाथ जोड़कर बोले, "हे मेरे प्रभु! तुम कितने दयालु हो कि तुमने परिवार की समस्त चिंताएँ समाप्त कर मुझे सब बंधनों से मुक्त कर दिया! अब मैं अपने जीवन का प्रत्येक क्षण तुम्हारी भक्ति और नाम संकीर्तन में लगाऊँगा।"

मृतक संस्कार पूर्ण होने के पश्चात् मणिदासजी ने साधु वेष धारण कर लिया। वे ब्रह्ममुहुर्त में ही उठ जाते, स्नान करते और फिर अपने हाथों में कर-ताल लेकर जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार पर पहुँच जाते। वहाँ तन्मय होकर कीर्तन करने लगते।

कभी-कभी ये उन्मत्त होकर 'जय जगन्नाथ-जय जगन्नाथ', 'राम-कृष्ण-गोविंद-हरि' का कीर्तन करते हुए नृत्य करने लगते। जब मंदिर के द्वार खुलते, तो ये जगन्नाथ भगवान् के श्रीविग्रह के समीप गरुड़ स्तंभ के पीछे जाकर खड़े हो जाते और वहाँ से अपने आराध्य देव की अलौकिक छवि को अपलक निहारा करते। फिर उन्हें साष्टांग प्रणाम कर उनके मधुर नामों का कीर्तन करने लगते। कीर्तन करते हुए ये अपने शरीर की सुधबुध खो बैठते। कभी झूम-झूमकर नाचने लगते, तो कभी खड़े ही रह जाते। कभी भक्ति के पदों को गाते, कभी स्तुति करते तो कभी फूट-फूटकर रोने लगते। कभी जगन्नाथ भगवान् को नमन करते तो कभी जोर-जोर से जय-जयकार करने लगते और कभी भूमि पर लोटने लगते। उनके शरीर में उस समय आठों सात्त्विक भावों का उदय हो जाता था।

उस समय जगन्नाथ मंदिर के मंडप के एक भाग में एक कथावाचक प्रतिदिन श्रीमद्भागवत की कथा सुनाया करते थे। कथावाचक पंडितजी विद्वान थे, किन्तु उनका हृदय अभी शुष्क था। वे अपनी प्रतिभा से श्रीमद्भागवत के श्लोकों के ऐसे नवीन सुंदर-सुंदर भाव बताते थे कि उन्हें सुनकर श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे। किंतु इतनी प्रतिभा होने के बाद भी पंडितजी के हृदय में अभी भगवद्भक्ति की रसधारा प्रवाहित नहीं हो सकी थी। एक दिन कथा में कथावाचकजी श्रोताओं के समक्ष किसी श्लोक के संबंध में कोई अद्भुत भाव बता रहे थे। उसी समय, मणिदास राम-कृष्ण-गोविंद-हरि के नाम का उच्च स्वर में संकीर्तन करते हुए मंदिर में पधारे और जगन्नाथ भगवान् के सुंदर रूप की छटा को देखते ही बेसुध हो उठे। उन्हें जगनाथ भगवान् के सिवा कुछ भी ज्ञान नहीं था कि कौन कहाँ बैठा है और क्या कर रहा है। वे जगन्नाथ भगवान् के दर्शन करते हुए उनके मधुर-मधुर नामों का गान करते हुए उन्मत्त होकर नृत्य करने लगे।

कथावाचकजी के सामने बैठे कुछ श्रोता उठे और मणिदासजी का संकीर्तन देखने लगे। कथा वाचक जी को यह अत्यंत बुरा लगा। उन्होंने मणिदास को डाँटते हुए वहाँ से चले जाने को कहा। किंतु भगवन्नाम संकीर्तन में मस्त मणिदासजी के कान तो कुछ भी सुन ही नहीं पा रहे थे। कथावाचकजी को क्रोध आ गया और कथा में विघ्न पड़ने से कुछ श्रोता भी उत्तेजित हो उठे। अब मणिदास पर गालियों और थप्पड़ों की बौछारें होने लगीं। जब मणिदासजी को बाह्य ज्ञान हुआ, तो वे ऐसा होते देख चकित रह गए। जब सारी बातें समझ में आईं तो इनके मन में जगन्नाथ भगवान् के प्रति प्रणय कोप जागा। उन्होंने सोचा, 'जब मेरे इष्टदेव के सामने ही उनकी कथा कहने और सुनने वाले भक्तजन मुझे मारते हैं, तो मैं वहाँ क्यों जाऊँ?'

मणिदास जगन्नाथ भगवान् से सचमुच प्रेम करते थे, अतः उन्हें उनसे रूठने का पूरा अधिकार था। वे जगन्नाथजी से रूठकर दिन भर भूखे-प्यासे एक मठ में पड़े रहे। इधर जगन्नाथ मंदिर में संध्या-आरती हो गई, पट बंद हो गए, किंतु प्रतिदिन की भाँति मणिदासजी वहाँ नहीं आए। रात्रि होने पर मंदिर के द्वार भी बंद हो गए।

इधर जगन्नाथ भगवान् को आज अपने प्रेमी भक्त के मुख से निःसृत कीर्तन, उसकी कर-ताल का संगीत सुनने और उसका प्रेमपूर्ण नृत्य देखने को न मिला, तो उनका हृदय छटपटाने लगा। रात्रि में पुरी-नरेश अपने शयन कक्ष में सो रहे थे। जगन्नाथ भगवान् उनके स्वप्न में आए और उनसे बोले, "अरे! तू कैसा राजा है? तुझे यह भी पता नहीं है कि मेरे मंदिर में क्या होता है? मेरा एक निश्छल भक्त मणिदास प्रतिदिन मंदिर में करताल बजकर नृत्य किया करता था। आज उसे तेरे कथा वाचक ने मार-पीटकर मंदिर से भगा दिया। आज न तो मैं उसका संकीर्तन सुन सका और न उसका नृत्य देख सका। इसलिए आज मुझे सब फीका-फीका लग रहा है। मेरा भक्त मणिदास आज मठ में भूखा-प्यासा पड़ा है। तू स्वयं जाकर उसे मना और ऐसी व्यवस्था कर कि आज के बाद उसके कीर्तन में कोई विघ्न न डाल सके और अपने कथावाचक पंडितजी की कथा की व्यवस्था लक्ष्मीजी के मंदिर में कर। मेरा मंदिर केवल मेरे प्रेमी भक्तों के लिए सुरक्षित रहे।"

इधर मठ में रूठे पड़े मणिदासजी ने अचानक देखा कि उनके सामने करोड़ों सूर्यों के समान शीतल प्रकाश चारों ओर फैल गया है। सहसा उसने देखा कि उस प्रकाश के मध्य गोल घेरे में उसके इष्टदेव जगन्नाथ भगवान् प्रकट हो गए हैं और उसी की ओर देखकर मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। मणिदास तो उनके सौंदर्य को एकटक निहारता ही रह गया। तभी जगन्नाथ भगवान् ने अपना वरद हस्त मणिदास के सिर पर रख दिया और अपनी अमृतमयी वाणी का रस उसके कानों में घोलते हुए से बोले, "पुत्र मणिदास! तू भूखा क्यों है? देख, तेरे भूखा रहने से आज मैंने भी भोजन नहीं किया है। उठ और जल्दी से भोजन कर ले!" भगवान् इतना कहकर अंतर्धान हो गए। मणिदास अभी सोच ही रहा था कि यह स्वप्न था या वास्तविकता कि अचानक उसके सामने महाप्रसाद का एक थाल प्रकट हो गया। अपने इष्टदेव की इस अनुकंपा को देखकर मणिदास के नेत्रों से प्रेमाश्रुओं की धारा बह चली। उसका अपने आराध्य के प्रति प्रणय रोष तत्क्षण दूर हो गया और वह आनंद से रोमांचित होकर भगवान् का प्रसाद पाने लगा।

इधर जब पुरी-नरेश की नींद खुली, तो वे तुरंत घोड़े पर बैठकर इस घटना की जाँच करने जगन्नाथ मंदिर जा पहुँचे। जब उन्हें घटना की सत्यता ज्ञात हुई तो वे उस भक्त के दर्शन करने को लालायित हो उठे, जिसके लिए जगन्नाथ भगवान् को स्वयं उनके सपने में आना पड़ा। पता लगाकर राजा मठ में मणिदास के समीप पहुँचे और उन्हें स्वप्न की घटना सुनाई। यह सुनकर मणिदास पुनः अपनी आँखों से आँसू बहाते हुए राम कृष्ण गोविंद हरि का उच्चारण करते हुए भवविभोर हो उठे। मणिदास का हृदय तो भगवद्भक्ति से लबालब भरा था, अतः उसमें अभिमान का लेश मात्र भी भला कैसे हो सकता था। अतः राजा के कहने पर वे तुरंत जगन्नाथ मंदिर में दौड़े चले आए और जगन्नाथ भगवान् के समक्ष स्तुति कर उन्मत्त होकर नृत्य करने लगे। राजा ने कथावाचकजी को समझाया और कथा की व्यवस्था जगन्नाथ मंदिर के नैर्ऋत्य कोण में स्थित श्रीलक्ष्मीजी के मंदिर में कर दी। मणिदास जीवन भर अपने जगन्नाथ भगवान् के दर्शन कर उन्हें अपने मधुर कीर्तन और करतल के संगीत से रिझाते रहे। अंत में 80 वर्ष की आयु में वे जगन्नाथ भगवान् की सेवा करने के लिए उनके दिव्य धाम को प्रयाण कर गए।

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